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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ४५ **पुनः मण्डूक-पदविन्यास—**वास्तु-मण्डल में ४५ देवता होते हैं। मण्डूकसंज्ञक वास्तुमण्डल में चौंसठ पद होते हैं। केन्द्र में ब्रह्मा के चार पद होते हैं। ब्रह्मा की ओर मुख किये चार देवों के तीन-तीन पद, सोलह देवों के आधे-आधे पद, आठ देवों के एक-एक पद एवं सोलह के दो पद होते हैं।।५६-५७।। ✺ परमशायिपदम् ✺ परमशायिपदे नवभागभाक् कमलजो मुखतस्तु चतुःसुराः । रसपदा द्विपदा हि विदिक्स्थिता बहिरथैकपदाः सकलामराः ॥५८॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे पददेवताविन्यासो नाम सप्तमोऽध्यायः परमशायी वास्तु-मण्डल में ब्रह्मा को नौ पद प्राप्त होते हैं। उनकी ओर मुख किये चारो देवों को छः-छः पद, कोण में स्थित देवों को दो-दो पद एवं बाहर स्थित सभी देवों को एक-एक पद प्राप्त होता है।।५८।। व्याख्यात्मक टिप्पणी बत्तीस पद-वास्तु ( श्लोक १-७ ) प्रायः वास्तु-ग्रन्थों में प्रचलित वास्तु-पद चौंसठ (८×८), इक्यासी (९×९) एवं शतपद वास्तु (१०×१०) हैं। मय ने बत्तीस वास्तुपदों का उल्लेख किया है। बत्तीस वास्तुपदों का उल्लेख मानसार एवं शिल्परत्न में प्राप्त होता है। मानसार (७.१-२५) में बत्तीस वास्तुपद इस प्रकार हैं—सकल, पैशाच ( पेचक ), पीठ, महापीठ, उपपीठ, उग्रपीठ, स्थण्डिल, चण्डित, परमशाधिक ( परमशायिक ), आसन, स्थानीय, देश्य, उभयचण्डित, भद्र, महासन, पद्मगर्भ, त्रियुत, कर्णाष्टक, गणित, सूर्यविशालक, सुसंहित, सुप्रतिकान्त, विशालक, विप्रगर्भ, विश्वेश, विपुलभोग, विप्रकान्त, विशालाक्ष, विप्रभक्ति, विश्वेशसार, ईश्वरकान्त एवं चन्द्रकान्त। ये नाम मयमत से किञ्चित् पृथक् हैं। शिल्परत्न ( पूर्व भाग-६.१-७ ) में वर्णित वास्तुपदों के अभिधान मयमत की सूची से अधिक निकट हैं—