भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

४४ मयमतम् मध्ये ब्रह्ममयः कायो मित्रः पुंस्त्वं विधीयते। इन्द्रश्चैवेन्द्रराजश्च दक्षिणः पाद ईरितः॥५२॥ वास्तुपुरुष का मध्य शरीर ब्रह्मा से निर्मित होता है एवं मित्र उसके पुरुषलिङ्ग होते हैं। इन्द्र एवं इन्द्रराज वास्तुपुरुष के दक्षिण पाद कहे गये हैं॥५२॥ रुद्रो रुद्रजयो वामपादः शेते त्वधोमुखः। वस्तुत्रिभागमध्ये तु वंशाः षट् प्रागुदङ्मुखाः ॥५३॥ रुद्र एवं रुद्रजय इसके वाम पाद हैं एवं वह अधोमुख होकर भूमि पर सोता है। इसके छः वंश (रेखायें) हैं, जो पूर्व एवं उत्तर की ओर होते हैं॥५३॥ वस्तुमध्ये तु मर्माणि ब्रह्मा हृदयमुच्यते। निष्कूटांशाः सिरा ज्ञेया इत्येष पुरुषः स्मृतः ॥५४॥ वास्तुमण्डल के मध्य में वास्तुपुरुष के मर्मस्थल होते हैं एवं ब्रह्मा वास्तुपुरुष के हृदय हैं। वास्तुमण्डल के निष्कूट अंश (रेखायें) वास्तुपुरुष की सिरायें (रक्तवाहिनी शिरायें) होती हैं॥५४॥ गृहे गृहे मनुष्याणां शुभाशुभकरः स्मृतः। तस्याङ्गानि गृहाङ्गैश्च विद्वान् नैवोपपीडयेत् ॥५५॥ मनुष्यों के प्रत्येक गृह में वास्तुपुरुष का निवास होता है, जो गृह में रहने वालों के शुभ एवं अशुभ परिणाम का कारक होता है। विद्वान् मनुष्य को चाहिये कि वास्तु- पुरुष के अङ्गों को गृह के अङ्गों (स्तम्भ, भित्ति आदि) से पीड़ित न करे॥५५॥ व्याधयस्तु यथासंख्यं भर्तुरङ्गे तु संश्रिताः। तस्मात् परिहरेद् विद्वान् पुरुषाङ्गं तु सर्वथा। वास्तुपुरुष का जो-जो अङ्ग पीड़ित होता है, गृहस्वामी के उस-उस अङ्ग में रोग होते हैं। अतः विद्वान् गृहस्वामी को वास्तुपुरुष के अंगों पर निर्माणकार्य का सर्वथा त्याग करना चाहिये। ✺ पुनर्मण्डूकपदम् ✺ चत्वारिंशच्च पञ्चैते देवतानां समुच्चयः ॥५६॥ अष्टाष्टांशे कस्या धस्तन्मुखाना- मिष्टं गांशं व्यञ्जनं षोडशानाम्। अष्टानां कः षोडशानां खभागं मण्डूकाख्ये स्थण्डिले तैतिलेषु ॥५७॥