भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ४३ महेन्द्र, राक्षस, पुष्प एवं भल्लाटक—ये चारो देवता दिशाओं में ( क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं पूर्व में ) दो-दो पद के भागी बनते हैं।।४५।। जयन्तश्चान्तरिक्षश्च वितथश्च मृषस्तथा। सुग्रीवो रोगमुख्यश्च दितिश्चैकैकभागिनः ।।४६।। जयन्त, अन्तरिक्ष, वितथ, मृष, सुग्रीव, रोग, मुख्य एवं दिति को एक-एक पद प्राप्त होता है।।४६।। ईशाद्यष्टामराः शेषाः कोणेष्वर्धपदेश्वराः। एवं क्रमेण भुञ्जीरन् मण्डूके वास्तुदेवताः ।।४७।। शेष बचे ईश आदि आठ देवता ( ईश, पर्जन्य, अग्नि, पूषा, पितृदेवता, दौवारिक, वायु एवं नाग ) कोणों पर आधा-आधा पद प्राप्त करते हैं। इस प्रकार मण्डूक वास्तुपद में देवताओं को स्थान प्राप्त होता है।।४७।। स्वस्वप्रदक्षिणवशात् पदभुक्तिक्रमं विदुः। ब्रह्माणं च निरीक्ष्यैते स्थिताः स्वस्वपदेऽमराः ।।४८।। अपने-अपने क्रम से ये सभी देवता बाँयें से दाहिने पदों में स्थित होते हैं। सभी देवगण ब्रह्मा को देखते हुये अपने-अपने पदों में स्थान ग्रहण करते हैं।।४८।। ❋ वास्तुपुरुषविधानम् ❋ षड्वंशमेकहृदयं चतुर्मर्म चतुःसिरम्। मेदिन्यां वास्तुपुरुषं निकुब्जं प्राक्शिरं विदुः ।।४९।। वास्तुपुरुष की रचना—वास्तु-पुरुष निकुब्ज पूर्व दिशा में सिर किये वास्तु- भूमि पर स्थित होता है। उसके छः वंश ( अस्थियाँ ), चार मर्मस्थल, चार सिरायें एवं एक हृदय होते हैं।।४९।। तस्योत्तमाङ्गं विज्ञेयमार्यको नाम देवता। सविन्द्रो दक्षिणभुजः साविन्द्रः कक्षमुच्यते ।।५०।। उस वास्तुपुरुष के सिर आर्यकसंज्ञक देवता होते हैं। सविन्द्र दाहिनी भुजा एवं साविन्द्र कक्ष होते हैं।।५०।। आपश्चैवापवत्सश्च सकक्षो वामतो भुजः। विवस्वान् दक्षिणं पार्श्वं वामपार्श्वं महीधरः ।।५१।। आप एवं आपवत्स कक्षसहित वाम भुजा, विवस्वान् दक्षिण पार्श्व एवं महीधर वाम पार्श्व बनते हैं।।५१।।