मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ मयमतम् ब्रह्मा मध्ये स्थितः शम्भुस्तन्मुखस्थाश्चतुःसुराः । आर्यो विवस्वान् मित्रश्च भूधरश्चैव कीर्तिताः ॥४०॥ मध्य में स्थित ब्रह्मा शम्भु हैं तथा आर्य, विवस्वान्, मित्र एवं भूधर—ये चार देवता उनकी ओर मुख करके स्थित होते हैं॥४०॥ चरकी च विदारी च पूतना पापराक्षसी । ईशानादि बहिः स्थाप्याश्चतुष्कोणे स्त्रियः स्मृताः । नपदा बलिभोक्तारः शेषाणां पदमुच्यते ॥४१॥ ईशान आदि चारो कोणों के बाहर क्रमशः चार स्त्री-देवताओं—चरकी, विदारी, पूतना एवं पापराक्षसी की स्थापना होनी चाहिये। ये चारो विना पद के ही बलि (वास्तु के निमित्त हविष् ) ग्रहण करती हैं। शेष देवों का पद कहा गया है॥४१॥ विंशत्सूत्रैः सन्धिभिः सप्तवेदैः षट्षट्संख्याभिश्चतुष्कैश्र षट्कैः । अर्कैः शूलैर्वेदसंख्याः सिराभिः संयुक्तं स्यादष्टकेनैकमेतत् ॥४२॥ इस प्रकार इकयासी संख्याओं का एक पद वास्तुचक्र में मण्डलदेवताओं का होता है, जिसका विवरण अग्रलिखित है—२० + ७ + ६ + ६ + ६ + ६ + ६ + १२ + ४ + ८ = ८१ अर्थात् खड़ी और पड़ी दश-दश रेखायें होने से इकयासी पद का वास्तुचक्र सम्पन्न होता है॥४२॥ ❋ मण्डूकपदम् ❋ चतुःषष्टिपदे मध्ये ब्रह्मणश्च चतुष्पदम् ॥४३॥ चौंसठ पद वाले मण्डूक पद में मध्य के चार पद में ब्रह्मा होते हैं॥४३॥ आर्यकादिचतुर्देवाः प्रागादित्रित्रिभागिनः । आपाद्यष्टामराः कोणेष्वर्धार्धपदभागिनः ॥४४॥ (ब्रह्मा के पश्चात् उनके चारो ओर ) आर्यक आदि चार देवता ( आर्य, विवस्वान्, मित्र, भूधर ) पूर्व से आरम्भ होकर तीन-तीन पद में स्थित होते हैं। आप आदि आठ देवता ( आप, आपवत्स, सविन्द्र, साविन्द्र, इन्द्र, इन्द्रराज, रुद्र एवं रुद्रजय ) ब्रह्मा के चारो कोणों में आधे-आधे पद में प्रतिष्ठित होते हैं॥४४॥ महेन्द्रराक्षसाद्याश्च पुष्पभल्लाटकादयः । दिशि दिश्यथ चत्वारो देवा द्विपदभोगिनः ॥४५॥