भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ४१ ( उपर्युक्त दोनों पदविन्यासों में ) वास्तुपद के मध्य में ब्रह्मा आदि देवता स्थापित किये जाते हैं। ईशान कोण से प्रारम्भ कर पृथक्-पृथक् स्थापित किये जाने वाले देवता का यहाँ वर्णन किया जा रहा है।।३३।। ✺ दैवतस्थानानि ✺ ईशानश्चैव पर्जन्यो जयन्तश्च महेन्द्रकः। आदित्यः सत्यकश्चैव भृशश्चैवान्तरिक्षकः ॥३४॥ वास्तुदेवों के स्थान—( ईशान कोण से प्रारम्भ करते हुये देवता इस प्रकार हैं— ) ईशान, पर्जन्य, जयन्त, महेन्द्रक, आदित्य, सत्यक, भृश तथा अन्तरिक्ष।।३४।। अग्निः पूषा च वितथो राक्षसश्च यमस्तथा। गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृषश्च पितृदेवताः ॥३५॥ ( आग्नेय कोण से नैर्ऋत्य कोण के देवता इस प्रकार हैं— ) अग्नि, पूषा, वितथ, राक्षस, यम, गन्धर्व, भृङ्गराज, मृष तथा पितृदेवता।।३५।। दौवारिकश्च सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः। असुरः शोषरोगौ च वायुर्नगस्तथैव च ॥३६॥ ( पश्चिम से वायव्य तक तथा उत्तर के देवता इस प्रकार हैं— ) दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, जलाधिप ( वरुण ), असुर, शोष, रोग, वायु एवं ( उत्तर दिशा में ) नाग।।३६।। मुख्यो भल्लाटकश्चैव सोमश्चैव मृगस्तथा। अदितिश्शोदितिश्चैव द्वात्रिंशद् बाह्यदेवताः ॥३७॥ ( उत्तर दिशा के देवता हैं— ) मुख्य, भल्लाटक, सोम, मृग, अदिति एवं उदिति—ये बत्तीस बाह्य पदों के देवता हैं।।३७।। आपश्चैवापवत्सश्चैवान्तः प्रागुत्तरे स्मृतौ । सविन्द्रश्चैव साविन्द्रश्चान्तः प्राग्दक्षिणे स्मृतौ ॥३८॥ अन्तःदेवों में पूर्वोत्तर ( ईशान ) में आप एवं आपवत्स देवता तथा पूर्व-दक्षिण ( आग्नेय कोण ) में सविन्द्र एवं साविन्द्र देवता होते हैं।।३८।। इन्द्रश्चैवेन्द्रराजश्च दक्षिणापरतः स्थितौ । रुद्रो रुद्रजयश्चैव पश्चिमोत्तरतो दिशि ॥३९॥ दक्षिण-पश्चिम ( नैर्ऋत्य कोण ) में इन्द्र एवं इन्द्रराज तथा पश्चिमोत्तर ( वायव्य कोण ) में रुद्र एवं रुद्रजय देवता कहे गये हैं।।३९।।