भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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४६ मयमतम् सकलं पेचकं पीठं महापीठोपपीठके ।। उग्रपीठं स्थण्डिलञ्च मण्डूकपरशायिकम्। आसनञ्च तथा स्थानीयञ्च देशीयमुच्यते ।। मयचण्डिताख्यपदं तथा भद्रमहासनम्। पद्मगर्भं त्रियुतकं वृत्ताभोगाभिधं पुनः ।। कर्णाष्टकपदं तद्वत्तथैव गणिकापदम्। पदं सूर्यविशालं तु सुसंहितपदं पुनः ।। सुप्रतीकान्तं तद्वद्विशालं विप्रगर्भकम्। विश्वेशं विपुलभोगं तथा विप्रतिकान्तकम् ।। विशालाक्षं विप्रभक्तिकञ्च विश्वेशसारकम्। तथैवेश्वरकान्ताख्यमिन्द्रकान्तपदं पुनः ।। द्वात्रिंशद्भेदसंयुक्तमेवं पदमिति स्मृतम्। किन्तु समराङ्गणसूत्रधार (१३) एवं अपराजितपृच्छा (५७) में वास्तुपदों के भेद मयमत से भिन्न हैं। समराङ्गणसूत्रधार में तीन प्रधान वास्तुभेद माने गये हैं—इक्यासी पद, एक सौ पद एवं चौंसठ पद— एकाशीतिपदो यः स्यात्तथा शतपदश्च यः। चतुःषष्टिपदो यश्च वास्तुरत्नः त्रिधोदितः ।। ( समराङ्गणसूत्रधार-१३.१ ) अपराजितपृच्छा (५७) में वास्तुपद के ग्यारह भेद वर्णित हैं—स्वस्तिक, पुष्पक, नन्द, षोडशाक्ष, कुलतिलक, सुभद्र, मरीचिगण, भद्रक, कामद, भद्र एवं सर्वतोभद्र— स्वस्तिकं पुष्पकं नन्दं षोडशाक्षं चतुर्थकम्। पञ्चमं कुलतिलकञ्च सुभद्रं षष्ठमेव च ।।१।। सप्तमो मरीचिगणो भद्रकं स्यात्तथाष्टमम्। नवमं कामदं प्रोक्तं दशमं भद्रमुच्यते ।।२।। सर्वतोभद्रनामाख्यमत ऊर्ध्वं न कारयेत्। वास्तुन्येकादशैव स्युः प्रोक्तानि परमेश्वरैः ।।३।। वास्तुपदों के देवता ( ३४-४० ) मयमत में वर्णित वास्तुपद के देवों की सूची मत्स्यपुराण (२५३.२४-३३) में दी गई सूची से पृथक् है। मत्स्यपुराण के अनुसार ईशान कोण से प्रारम्भ कर देवों की सूची इस प्रकार है—शिखी, पर्जन्य, जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश, अन्तरिक्ष,