भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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षष्ठोऽध्यायः 卐 दिक्परिच्छेदः ३१ बनानी चाहिये। मण्डल के दो छोरों पर ये चापाकृतियाँ एक-दूसरे को काटती हैं। इस प्रकार मत्स्य की आकृति बनती है।।१०।। सूत्राणि स्थपतिः प्राज्ञः प्रागुत्तरमुखानि च । इन सूत्रों से बुद्धिमान स्थपति उत्तर एवं दक्षिण दिशा का निर्धारण करते हैं। ( पूर्व के बाँयीं ओर उत्तर दिशा एवं दाहिनी ओर दक्षिण दिशा होती है। इस प्रकार भूमि में दिशा का ज्ञान होता है )। ☀ अपच्छाया ☀ कन्यायां वृषभे राशावपच्छायात्र नास्ति हि ॥११॥ अशुद्ध छाया—जब सूर्य कन्या या वृषभ राशि में होता है, उस समय सूर्य की अपच्छाया नहीं पड़ती है ( अर्थात् इस स्थिति में शङ्कु की छाया सीधे पूर्व और पश्चिम दिशा पर पड़ती है ) ।।११।। विशेष—सूर्य की छाया बारहों महीनों में एक समान नहीं होती है। अतः सूर्य के नक्षत्रों के सङ्क्रमण के अनुसार शुद्ध रूप से पूर्व एवं पश्चिम का निर्धारण किस प्रकार किया जाय एवं अपच्छाया से बचा जाय, इसका उपाय आगे के श्लोकों में वर्णित है। मेषे च मिथुने सिंहे तुलायां द्व्यङ्गुलं नयेत्। कुलीरे वृश्चिके मत्स्ये शोधयेच्चतुरङ्गुलम् ॥१२॥ मेष, मिथुन, सिंह एवं तुला राशि में सूर्य के रहने पर जहाँ शङ्कु की छाया पड़े, उससे दो अङ्गुल पीछे हट कर पूर्व एवं पश्चिम का निर्धारण करना चाहिये। जिस समय सूर्य कर्क, वृश्चिक एवं मीन राशि पर हों, उस समय चार अङ्गुल हट कर दिशानिर्धारण करना चाहिये।।१२।। धनुःकुम्भे षडङ्गुल्यं मकरेऽष्टाङ्गुलं तथा। छायाया दक्षिणे वामे नीत्वा सूत्रं प्रचारयेत् ॥१३॥ धनु एवं कुम्भ पर सूर्य के रहने पर छः अङ्गुल एवं मकर पर आठ अङ्गुल हट कर शङ्कु की छाया के दाहिने एवं बाँयें सूत्र का प्रयोग करना चाहिये।।१३।। ☀ रज्जुलक्षणम् ☀ अष्टयष्ट्यायता रज्जुस्तालकेतकवल्कलैः । कार्पासपट्टसूत्रैश्च दर्भैर्न्यग्रोधवल्कलैः ॥१४॥ माप - सूत्र का लक्षण—रज्जु अथवा सूत्र को आठ दण्ड लम्बा होना चाहिये।