भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३० मयमतम् ( उपर्युक्त माप उत्तम शङ्कुमान का है। ) मध्यम शङ्कु अट्ठारह अङ्गुल लम्बा एवं कनिष्ठ शङ्कु बारह या नौ अङ्गुल लम्बा होता है। लम्बाई के समान ही इसका मूल एवं अग्र भाग में भी माप रखना चाहिये॥५॥ दन्तं वै चन्दनं चैव खदिरः कदरः शमी। शाकश्च तिन्दुकश्चैव शङ्कुवृक्षा उदीरिताः ॥६॥ दन्त ( मौलसिरी ), चन्दन, खैर या कत्था, कदर, शमी, शाक ( सागौन ) एवं तिन्दुक ( तेंन्दू ) के वृक्ष शङ्कु-वृक्ष कहलाते हैं अर्थात् इनके काष्ठ से शङ्कुनिर्माण करना चाहिये॥६॥ अन्यैः सारद्रुमैः प्रोक्तं तस्याग्रं चित्रवृत्तकम्। शङ्कुं कृत्वा दिनादौ तु स्थापयेदात्तभूतले ॥७॥ इनके अतिरिक्त कठोर काष्ठ वाले वृक्षों से भी शङ्कु-निर्माण किया जा सकता है। शङ्कु का अग्र भाग चित्रवृत्तक ( दोषहीन गोलाई ) होना चाहिये। शङ्कु-निर्माण के पश्चात् प्रातःकाल भूतल के पूर्व निर्धारित स्थल पर उसे स्थापित करना चाहिये॥७॥ शङ्कुद्विगुणमानेन तन्मध्ये मण्डलं लिखेत्। पूर्वापराह्नयोश्छाया यदि तन्मण्डलान्तगा ॥८॥ शङ्कु-प्रमाण का दुगुना माप लेकर शङ्कु को केन्द्र बना कर वृत्त खींचना चाहिये। दिन के पूर्वाह्न एवं अपराह्न में उस मण्डलाकृति पर शङ्कु की छाया पड़ती है॥८॥ तद्विन्दुद्वयगं सूत्रं पूर्वापरदिशीष्यते। बिन्दुद्वयान्तरभ्रान्तशफराननपुच्छगम् ॥९॥ उपर्युक्त छायायें जिन-जिन बिन्दुओं पर पड़ती हैं, उन बिन्दुओं को सूत्र से मिलाना चाहिये। इससे पूर्व एवं पश्चिम दिशा का ज्ञान होता है ( पूर्वाह्न में जहाँ छाया पड़ती है, वह पश्चिम दिशा एवं अपराह्न में जहाँ छाया पड़ती है, वह पूर्व दिशा होती है )। पूर्वोक्त बिन्दुओं को केन्द्र बनाकर मछली की आकृति बनानी चाहिये॥९॥ दक्षिणोत्तरगं सूत्रमेवं सूत्रद्वयं न्यसेत्। उदगाद्यपरान्तानि पर्यन्तानि विनिक्षिपेत् ॥१०॥ दो सूत्रों को बिन्दुओं के केन्द्र में इस प्रकार रखना चाहिये कि वे दक्षिण से उत्तर तक जायें। इसी प्रकार दूसरे सूत्र को उत्तर से दक्षिण तक ले जाना चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि एक बिन्दु को केन्द्र बनाकर चाप की आकृति उत्तर से दक्षिण तक बनानी चाहिये। पुनः दूसरे बिन्दु को केन्द्र बनाकर दूसरी चापाकृति