मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठोऽध्यायः ( दिक्परिच्छेदः ) वक्ष्येऽहं दिक्परिच्छेदं शङ्कुनार्कोदये सति । उत्तरायणमासे तु शुक्लपक्षे शुभोदये ॥१॥ दिशा-निर्धारण—मैं ( मय ) दिशा के निर्धारण के विषय में कहता हूँ। यह कार्य उत्तरायण मास में शुभ शुक्ल पक्ष में सूर्योदय होने पर शङ्कु द्वारा करना चाहिये।।१।। प्रशस्तपक्षनक्षत्रे विमले सूर्यमण्डले । गृहीतवास्तुमध्ये तु समं कृत्वा भुवः स्थलम् ॥२॥ शुभ पक्ष एवं नक्षत्र में सूर्यमण्डल के निर्मल रहने पर ग्रहण किये गये वास्तु के मध्य की भूमि को समतल करना चाहिये।।२।। जलेन दण्डमात्रेण समं तु चतुरस्रकम् । जिस स्थान पर शङ्कुस्थापन करना हो, उस स्थान से चारो दिशाओं में दण्डप्रमाण से चौकोर किये गये भूखण्ड को जल द्वारा समतल करना चाहिये।। ✺ शङ्कुलक्षणम् ✺ तन्मध्ये स्थापयेच्छङ्कं तन्मानमधुनोच्यते ॥३॥ उस समतल भूमि के मध्य में शङ्कुस्थापन करना चाहिये। अब शङ्कु के प्रमाण का वर्णन किया जा रहा है।।३।। अरत्निमात्रमायाममग्रमेकाङ्गुलं भवेत् । मूलं पञ्चाङ्गुलं व्यासं सुवृत्तं निर्व्रणं वरम् ॥४॥ शङ्कु का लक्षण इस प्रकार है—यह एक हाथ लम्बा हो, शीर्ष पर इसका माप एक अङ्गुल हो तथा मूल भाग में इसका व्यास पाँच अङ्गुल हो। इसकी गोलाई सुन्दर हो, किसी प्रकार का इसमें व्रण न हो अर्थात् इसका काष्ठ कटा-फटा न हो एवं श्रेष्ठ हो।।४।। अष्टादशाङ्गुलं मध्यं कन्यसं द्वादशाङ्गुलम् । आयामसदृशं नाहं मूलेऽग्रे तु नवाङ्गुलम् ॥५॥