मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ मयमतम् मध्यमयुक्ता वीथी ब्रह्माख्या सैव नाभिः स्यात् । द्वारसमेता वीथी राजाख्या च द्विपाश्र्वतः क्षुद्रा ॥३७॥ ग्राम की मध्य-वीथी 'ब्रह्मवीथी' होती है। वही ग्राम की नाभि होती है। द्वार से युक्त वीथी 'राजवीथी' होती है। दोनों पार्श्वों में बनी वीथी 'क्षुद्रा' होती है।।३७।। सर्वाः कुट्टिमकाख्या मङ्गलवीथी तथैव रथमार्गम् । तिर्यग्द्वारसमेता नाराचपथा इति ख्याता । उत्तरदिङ्मुखमार्गाः क्षुद्रार्गलवामनाख्यपथाः ॥३८॥ सभी विथियाँ 'कुट्टिमका' संज्ञक होती हैं। इसी प्रकार मङ्गलवीथी 'रथमार्ग' कहलाती है। तिर्यग् द्वार ( प्रधान द्वार का सहायक द्वार ) युक्त वीथियाँ 'नाराचपथा' कहलाती हैं। उत्तर की ओर जाने वाले मार्ग 'क्षुद्र', 'अर्गल' एवं 'वामन' कहे जाते हैं।।३८।। ग्रामावृता मङ्गलवीथिकाख्या पुरावृता या जनवीथिका स्यात् । तयोस्तु रथ्याभिहिताभिधा स्यात् पुरातनैरन्यतमेष्वथैवम् ॥३९॥ ग्राम को घेरने वाली वीथी 'मङ्गलवीथिका' तथा पुर को आवृत करने वाली वीथी 'जनवीथिका' होती है। इन दोनों को 'रथ्या' भी कहा जाता है। प्राचीन विद्वानों के अनुसार अन्य मार्गों को भी इसी प्रकार समझना चाहिये।।३९।। ⁕ ग्रामभेदाः ⁕ द्विजकुलपरिपूर्णं वस्तु यन्मङ्गलाख्यं नृपवणिगभियुक्तं वस्तु यत्तत् पुरं स्यात् । तदितरजनवासं ग्राममित्युच्यतेऽस्मिन् मठमिति पठितं यत्तापसानां निवासम् ॥४०॥ ग्राम के भेद—ब्राह्मणों से परिपूर्ण वसति-विन्यास को 'मङ्गल' कहते हैं। राजा ( क्षत्रिय ) तथा व्यापारियों से युक्त स्थान 'पुर' कहलाता है। जहाँ अन्य जन निवास करते है, उसे 'ग्राम' कहते हैं। जहाँ तपस्वियों का निवास होता है, उसे 'मठ' कहते हैं।।४०।। प्रागुदगग्रं मार्गं ककनीकृतदण्डवत्तु तन्मध्ये ॥४१॥ द्वारचतुष्टययुक्तं दण्डकमिति भण्यते मुनिभिः । दण्डवदेका वीथी साप्येवं दण्डकं प्रोक्तम् ॥४२॥ पूर्व एवं उत्तर की ओर सीधी रेखा से बने हुये दण्ड के समान मार्ग होते हैं एवं