भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ५९ चार द्वारों से युक्त होते हैं। ऐसे ग्राम को मुनिजन दण्डक कहते हैं। जहाँ दण्ड के सदृश एक वीथी होती है, उसे भी 'दण्डक' ग्राम कहते हैं।।४१-४२।। नवपदयुक्ते ग्रामे परितो मार्ग पदस्य तस्य बहिः । तस्मात् प्रागुदगग्रात् प्राग्वीथी दक्षिणाग्रा सा ॥४३॥ नौ पदों से युक्त ग्राम में पद से बाहर चारो ओर एक मार्ग होता है। एक वीथी उत्तर-पूर्व से प्रारम्भ होकर पूर्व की ओर जाती है। वह दक्षिण से प्रारम्भ होती है।।४३।। तस्मात् प्राग्दक्षिणतो दक्षिणवीथी प्रतीचिमुखा । तस्मादवागपरतः पश्चिमवीथ्यग्रमुत्तरतः ॥४४॥ दक्षिण वीथी पूर्व-दक्षिण से प्रारम्भ होकर पश्चिम की ओर जाती है। दक्षिण से पश्चिम होकर जाने वाली वीथी उत्तर की ओर जाती है।।४४।। अपरोत्तरतस्तस्मादुत्तरवीथ्यां मुखं प्राच्याम् । एतत् स्वस्तिकमुदितं स्वस्त्याकृत्या चतुर्मार्गम् ॥४५॥ दूसरी वीथी उत्तर से प्रारम्भ होती है, इसलिये उत्तरवीथी है। इसका मुख पूर्व की ओर होता है। इस ग्राम को 'स्वस्तिक' कहा गया है। इसके चार मार्ग स्वस्तिक की आकृति के होते हैं।।४५।। प्राक्प्रत्यग्गतमार्गैस्त्रिभिरुदग्ग्रैस्त्रिभिश्चतुर्भिरथो । पञ्चभिरपि षट्सप्तभिरपि युक्तं प्रस्तरं पञ्च ॥४६॥ 'प्रस्तर' ग्राम पाँच प्रकार के होते हैं। इसमें पूर्व से पश्चिम तीन मार्ग जाते हैं। उत्तर से जाने वाले मार्ग तीन, चार, पाँच, छः या सात होते हैं।।४६।। प्राग्ग्रैस्तु चतुर्भिर्द्वादशशिवपङ्क्तिनन्दवसुमार्गैः । उदग्ग्रैरभियुक्तं ह्येतत् प्रोक्तं प्रकीर्णकं पञ्च ॥४७॥ 'प्रकीर्णक' ग्राम पाँच प्रकार के होते हैं। इसमें चार मार्ग पूर्व से पश्चिम जाते हैं। उत्तर से बारह, ग्यारह, दस, नौ या आठ मार्ग जाते हैं।।४७।। प्राक्प्रत्यग्गतमार्गैः पञ्चभिरुदग्ग्रैस्त्रयोदशभिः । त्रिःसप्तभिरथ तिथिभिः षोडशभिः सप्तदशभिरपि मार्गैः ॥४८॥ ( नन्द्यावर्त ग्राम का लक्षण इस प्रकार है- ) पाँच सड़कें पूर्व से पश्चिम की ओर जाती हैं। उत्तर दिशा से तेरह, इक्कीस, पन्द्रह, सोलह एवं सत्रह मार्गों द्वारा ( इस ग्राम का विन्यास किया जाता है )।।४८।। युक्तं नन्द्यावर्तं दिक्षु चतुर्द्वारसंयुक्तम् । नन्द्यावर्ताकृत्या बाह्ये द्वारैरबाह्यातो मार्गैः ॥४९॥