मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवियोगाभिव्यक्ति ४३ आवण कह गए अजहू न आए, जिवडो अति अकुलावै । तुम दरसण की आस रमैया, कब हरि दरस दिखावै । चरण कवल की लगन लगी, नित बिन दरसण दुख पावै । मीराँ कूँ प्रभु दरसण दीज्यो, आनन्द वरणूं न जावै । ॥५०॥ पद की चतुर्थ पंक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर प्राप्त है। “तुम दरसण की आस रमैया, निसि दिन चितवत जावै ।” २३ सावरिया, मोरे नैणा आगे रहिज्यो जी । म्हाने भूल मत जाज्यो जी, मोहन लगन लगी निभाज्यो जी । राणा जी भेज्यो विष रो प्यालो, सो अमृत कर पीज्यो जी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल बिछुड़न मत कीज्यो जी । ॥५१॥ † उपर्युक्त पद की प्रथम दो और अन्तिम दो पंक्तियो मे अर्थ समन्वय नही होता। द्वितीय पंक्ति मे प्रयुक्त ‘पीज्यो’ शब्द के स्थान पर ‘दीज्यो’ शब्द ही अधिक अर्थमय सिद्ध होता है। २४ सावरिया, म्हारी प्रीतडली निभाज्यो । प्रीत करो तो स्वामी ऐसी कीज्यो, अधविच मत छिटकाज्यो१ । तुम तो स्वामी गुणरा सागर, म्हारा ओगुण चित मति लाज्यो । काया गढ घेरा ज्यो पड़ या छै, ऊपर आपर खाज्यो । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चित्त चरणा रखाज्यो । ॥५२। पद की तीसरी पंक्ति सर्वथा अर्थहीन प्रतीत होती है। १. दूर हटा देना।