मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह तुम दरसण की भी मन माहि, आई मिलो करि कृपा गुँमाई। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, आई दग्ग द्यो सुख के सागर। ॥८८॥ ८ कभी म्हांरे गैलरी आव रे, जिया की तपन बुझाव रे, म्हाँरे मोहन प्यारे। तेरे सांवले बदन पर, कोई कोट काम वारे। तेरी खूबी के दरस पै, नैन तरसते हमारे। घायल फिरूं तडपती, पीड जाने नही कोई। जिस लागी पीड़ प्रेम की, जिन लाई जानं सोई। जैसे जल के सोखे मीन क्या जीवे बिचारे। कृपा कीजै, दरसु दीजै, मोराँ नन्द के दुलारे॥ ८९॥। उपर्युक्त पद की भाषा विचारणीय हे। राजस्थानी, ब्रज, उर्दू और खडी बोली चारो का ही इसमे सम्मिश्रण हुआ है, जैसा कि शायद ही किसी अन्य पद में हुआ हो। साथ ही, 'मीराँ नन्द के दुलारे' जैसा प्रयोग भी इस पद की विशेषता है। 'बृहद्राग रत्नाकर' मे एक ऐसा ही पद 'मीर माधो' के नाम पर भी मिलता है। 'कभी गली हमारी आव रे, मोरे जिया की तपन बुझाव रे, नन्दजू के मोहन प्यारे लाला। तेरे सांवरे बदन पै कई कोटि काम वारैं, तेरियां जुल्फा दिलदिया कुलफा जी, दोऊ नैन है सतारे। तेरे खूबी के दरस पै लाल, नयन तरसते हमारे। पिया पिया करै पपीहरा रे, निशि दिन सो याद तेरी। मेरे सांवले सलोने मोहन, आसा दर्शन केरी। घायल फिरूँ दरसण की, पीर जाने नही कोई। मोंहि लागी चोट प्रेम की, जिन लाई जानै सोई।