मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह आप तो जाय विदेसा छाये, हम वासी मधुवन का रे। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, चरण कँवल हरिजन का रे ॥९२॥† पदाभिव्यक्ति मे संगति नही है। ९२ गोविन्द, कबहुँ मिलै पिया मोरा। चरण कँवल कूँ हँसि हँसि देखूँ, राखूँ नैणां नेरा१। निरखण कूँ मोहि-चाव घणेरो, कब देखूँ मुख तेरा। व्याकुल प्राण धरत न धीरज, मिलि तू नित सबेरा२। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, ताप तपन बहुतेरा ॥ ९३ ॥ पदाभिव्यक्ति से 'गोविन्द' और 'पिया' की दो विभिन्न हस्तियाँ स्पष्ट हो उठती है। यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न है। ९३ भीजै म्हाँरो दावण चीर, सावणियो लूम रहियो के। आप तो जाय विदेसाँछाये, जिवणो धरत न धीर। लिख लिख पतियाँ संदेशा भेजूँ, कब घर आवै म्हाँरो पीव। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, दरसन द्यो नै बलवीर ॥९४॥ ९४ म्हाँरे घर आओ, स्याम, गोठडी३ कराइये। आनन्द उछाव करूँ, तन मन भेट धरूँ। मै तो हूँ तुम्हारी दासी, ताँकूँ तो चितारियो। गिगन४ गरजि आयो, बदरा बरसे भायो। सारंग सबद सुनि ब्रिहन पुकारिये। १ पास, नजदीक, २ शीघ्र, ३ गोष्ठी, ४ गगन, आकाश।