मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवियोगाभिव्यक्ति ६७ ऐसे पदो को प्रक्षिप्त ही मान लेना युक्ति सगत प्रतीत होता है, क्योकि इसकी अभिव्यक्ति मे वह भाव भाषा का गाम्भीर्य नही, जो मीराँके पदो की विशेषता है। इसमे क्रिया-पद विशेष विचारणीय है। २० रसभरिया म्हाराज मोकूँ, आप सुनाई बाँसुरी। सुनत बाँसुरी भइ बावरी, निकसन लग्या साँस री। रकतर रती भर ना रह्योरी, नही मास भर माँस री। तन तिनकासो है गयो री, रही निगोरी साँस री। मै जमुना जल भरन जात ही, सास नन्द की भास री। मीराँ कूँ प्रभु गिरिधर मिल गयो,पूजो मनकी आस री॥१०१॥† अभिव्यक्ति के आधार पर पद की प्रामाणिकता सर्वथा संदिग्ध है। २१ प्यारी हट माँड्यो¹ माँझल² रात। कब की ठाढी अरज करत हूँ, होई जासी परभात । तलफत तलफत बोहो दिन बीते, कबहूँ न बूझी बात । जब के गए म्हारी सुध नाहि लीनी, तुम बिन फीको म्हारो गात । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, कर मीड़त पछितात ॥१०२॥† उपर्युक्त पद के विषय मे श्री सूर्यनारायण जी चतुर्वेदी लिखते है, "पूर्वापर असबद्ध सा ज्ञात होता है। यदि "प्यारी" के स्थान पर "प्यारा" होता तो असबद्ध नही था।" मेरे विचार मे पद की पूर्वापर असबद्धता हर हालत मे बनी रहती है, क्योकि प्रथम दो पक्तियो से मिलन और शेष पद से वियोग ही लक्षित होता है। ऐसे पदो को प्रामाणिक सग्रह मे स्थान न मिलना ही युक्तियुक्त प्रतीत होता है। १ किया, २ बीच ।