मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ · मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह २२ लाग रही ओसेर१ कान्हा, तेरी लाग रही ओसेर। दरसण दीजे, कृपा कीजे, कहाँ लगाई बेर । दिन मे नही चैन, रैन नही निद्रा, बिरह बिथा लई घेर । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सुण जो म्हारी टेर । ॥१०३॥ २३ माधो बिन बसती उजार मेरे भावै२। एक समै मोतियन के धोके, हसा चुगत जुवार । सरवर छोड़ तलैया बैठे, पख लपट रही गार। सरवर सूख तरवर कुम्हलाये, हसा चले उड़ार । मीराँ के प्रभु मिलोगे, लाम्बी भुजा पसार ॥१०४॥† पदाभिव्यक्ति अर्थहीन और असंगत है। २४ दासी म्हारा मारुड़ा मारु३ जी से कहना। मोय नीद न आवै नैना। जे मेरा गोविन्द दूर बसत है, मोय सदेशो देना। जे मेरा गोविन्द गली देखे, सनक४ सनक सुन लेना। जे मेरा गोविन्द बैन५ बजावै, प्रेम मगन होय कहना। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल चित देना ॥१०५॥† श्री सूर्यनारायण चतुर्वेदी जी इस पद के विषय मे लिखते है, “मारुडा” के स्थान मे स्यात् “भुजरा” होगा। लिपि दोष से अथवा अन्य किसी दोष से अपभ्रंश हुआ ज्ञात होता है।” १ हुसेर, याद, २ लगती है, ३. पति, ४ धैर्य सहित, ५ वेणु।