मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवियोगाभिव्यक्ति ६९ श्री चतुर्वेदी जी का कहना बहुत यथार्थ प्रतीत होता है, क्योकि "मारु" और "मारुडा" दोनो एक ही शब्द है । "मारूड़ा" कोई स्वतंत्र शब्द न होकर "मारु" का ही रूपान्तर मात्र है। अपने बुजुर्गो या अन्य किसी भी विशेष सम्मानित व्यक्ति के प्रति 'मुजरौ" विनम्रता पूर्वक नमस्कार के अर्थ मे आज भी प्रयुक्त होता है । २५ तुम हयाँ ही रहो राम रसियाँ, थांरी साँवरी सूरत मे मन बसिया । क्याने तो राम जी घोडा सिणगारो, क्या ने पाषर कसिया। चुण चुण कलियाँ सेज सँवारु, ओर गादी तकिया । बोहोत दिना की पंथ निहारूँ, तुम आया रग रञ्चिया । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, चरण कमल म्न बसिया ।। १०६।।† पदाभिव्यक्ति असगत है । २६ नेहा समद बिच नाव लगी है, बाल न लगत बही जात अकेली । लाज को लगर छूटि गयो है, बही जात बिन दाम की चेरी । मलहन कर से छाड दई है, आस बडी गोपाल ज्यो तेरी । अब के नाम लगावो नातर, लोग हँसेगे बजा के हतेरी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मेरी सुध लीज्यो प्रभु आन सबेरी ।।१०७।।† पदाभिव्यक्ति असगत है। प्रथम पक्ति मे 'बाल' के स्थान पर सम्भवतः 'पाल' शब्द हो । २७ माई म्हाने मोहन मित्र मिलाय, मोहन मित्र मिलाय । रसियो है उर अंतर बसियो, या बिनु कछु न सुहाय । पात लियो¹ साँवरियो लोभी, राखूं कठ लगाय । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तन की तपत बुझायं । ।।१०८।। १ सुगठित शरीरवाला।