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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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७० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह २८ मे खडी निहारू बाट, चितवन चोट कलेजे बह गई, सुन्दर स्याम सूं घाट। मथुरा मे कुबज्या कर राखी, महाजन की सी हाट। केसर चदन लेपन कीन्हो, मोहन तिलक ललाट। हमारा पिलैंग जडाऊ छोड् या, बणिया¹ रेशमी पीली पाट। क्याँ पर राजी भयो साँवरो, चेरी के नही खाट। अजहूँ न आयो कँवर नन्द को, क्यॉरी लागी चाट। छाड गयो मरुधार साँवरो, बिन अकल को जाट²। आप बिना गोपी सब ब्रज की, व्याकुल भई निराट। मीराँ के प्रभु गोपी दरसन दीज्यो, करज्यो आनन्द ठाट। ॥१०९॥† २९ उधो, म्हाँरे मन की मन मे रही। एक समै मोहन घर आये, मे दधि मथत रही। या दुनियाँ को झूठो धधो, मै हरि को बिसर गई। वा कपटी की का कहूँ, उधो बचन प्रतीत नही। नेन हमारे ऐसे झूरै, उलटी गंग बही। इत गोकुल उत मथुरा नगरी, बीच मे जमुना बही। आप मोहन जी पार उतर गया, हम सै कछु ना कही। ब्रज बनिता को संग छाडि कै, कुबज्याँ सग लई। मीराँ के प्रभु गिरिधर अविनासी, चरणा लिपट रही। ॥११०॥ अभिव्यक्ति असगत और अर्थहीन है। ३० तुम आवो हो कृपा निधान बेग ही। मेरे मदिर आये प्रभु निकसे, कदी³ महलहूँ न आये मै दीदार देख री। १ बना हुआ, २ राजस्थान की स्थानीय जाति विशेष, जो परिश्रम और सत्यता के लिये प्रसिद्ध होते हुए भी सर्वथा बुद्धिहीन मानी जाती हैं। ३ कभी।