मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 197, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ेंमिलन और बधाई १३६ मिश्रित भाषा में प्राप्त पद । १ तनक हरि चितवौ जी मेरी ओर । हम चितवत तुम चितवत नही, दिल के बडे कठोर । मेरो आसा चितवनि तुमरी, और न दूओ दोर । तुम से हमकू कबर मिलोगे, हम्सी लाख करोर । उमी ठाढी अरज करत हू, अरज करत भयो मोर । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, देस्यूँ प्राण अकोर ॥२२३॥† आराध्य के निकट रहते हुए भी न बोलने की अभिव्यक्ति एक और पद मे भी मिलती हैं, यद्यपि इस पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध हैं । 'बृहद्राग रत्नाकार' में निम्नांकित पद प्राप्त हैं जिसकी प्रथम दो पंक्तियाँ उपर्युक्त पद की प्रथम दो पंक्तियो से हूबहू मिलती है। बहुत सम्भव है कि कृष्णप्रिया का ही यह पद मीराँ के नाम पर प्रचलित हो गया है । तनक हंस हेरो मेरी ओर। हम चितवत तुम चितवत नाही, काहे भई हो कठोर । निस दिन तुमरो ही नाम रटत हो, चातक ज्यो घनघोर । कृष्णाप्रिया दर्शन के लोभी, जैसे चन्द्र चकोर । (पद २५७, पृष्ठ ७१,) २ आज सखी मेर आनन्द भयो है, घर मे मोहन लाघोरी । बन जोईं वृन्दावन जोईं, जोईं बिरज सब बाघोरी । सतवे मलिये अजब झरोखे, कही ते हरि जी लाघोरी । म्हारा तो घर में मही घनेरी, हरी चोर चोर दधि खाधोरी ।