मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 225, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ें“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६९ ७ जोगिया म्हांने दरस दियां सुख होइ। नातरि दुखी जग माहि जीवडो, निसि दिन झूरै¹ तोइ। दरस दिवानी भई बावरी, डोली सब ही देस। मीराँ दासी भई है पडर,² पलट्ट्या काला केस। ॥२६६॥ ८ तुम आवो जी प्रीतम मेरे, नित बिरहणी मारग हेरे। दुख मेटण सुख दाइक³ तुम हौ, किरपा करिल्यौ नेरे⁴। बहुत दिना की जोऊ मारग, अब क्यूँ कुरो रे अबेरे⁵। आतर⁶ अधिक कहू किस आगे, आज्यौ मित⁷ सबेरे। मीराँ दासी चरनन की, हम तेरे तुम मेरे। ॥२६७॥ ९ प्यारे दरसन दीज्यौ रे, आइ रे आइ। तुम बिन रह्यौ न जाइ रे जाइ। जल बिन कंवल, चन्द बिन रजनी। ऐसे तुम देख्या बिन सजनी। किरपा करि कै बेग पधारो। बिरह करेजा खाइ रे खाइ। दिवस न भूख नीद नही नैना। मुख सूँ कहत न आवै बैना। १ किसी की विरह स्मृति मे शनै. शनै क्षीण होते जाना, २-सफ़ेद, ३ देने वाले, ४ निकट, ५ देर, ६ आतुरता, ७ मित्र, राजस्थानी मे 'मीत' प्रणय जनित मित्रता को ही कहते हैं।