मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 227, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ें“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १७१ पाठान्तर १, माई म्हांरी हरि न बूझी बात। पिंडं मे से प्राण पापी, निकस क्यूं नही जात। रैण अधेरी, बिरह घेरी, तांरा गिणत निसी जात। ले कटारी कठ चीरू, करूगी अपघात¹। पाट² न खोल्या, मुखा न बोल्या, साझि लग परभात। अबोलना मे अवधि बीती, काहे की कुसलात। सुपन मे हरि दरस दीन्हो, मै न जाण्यो हरि जात। नैना म्हारा उघडि आया, रही मन पछतात। आवण आवण होय रह्यो री, नही आवण की बात। मीराँ व्याकुल बिरहणी रे बाल ज्यो बिललात। पद विशेष महत्वपूर्ण है। अभिव्यक्ति के आधार पर पद को दो अंशो मे बाटा जा सकता है। “माई ... कुसलात” अर्द्धांश से आराध्य की निकटता और अप्रसन्नता ही सिद्ध होती है। परन्तु “सावण आवण तारा गिणत निरास” से वियोग की ही स्थिति स्पष्ट हो उठती है। प्रथम पाठ की अन्तिम दोनो पक्तियो को उपर्युक्त दोनो ही अभिव्यक्तियो के साथ घटाया जा सकता है। द्वितीय पद की आठवी पंक्ति की भावना विशेष विचारणीय है। पश्चात्ताप की अभिव्यक्ति दो एक अन्य पदो मे भी मिलती है। पद की प्रमुख भावना के अनुसार आराध्य की निकटता और अप्रसन्नता ही व्यक्त होती है। इस अप्रसन्नता से ऊबकर मीराँ आत्महत्या का भी निश्चय कर लेती है, परन्तु आराध्य दर्शन के लोभ मे वह भी नही कर पाती । ऐसी अभिव्यक्ति किसी भी अन्य पद मे नही प्राप्त होती। अत उपर्युक्त पद विशेष रूप से विचारणीय है। १ आत्महत्या, २ दरवाजा या पर्दा, ।