मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ११ कुण१ बांचे पाती , प्रभु बिन कुण बांचे पाती । कागद लै ऊधौ जी आए, कहा रहै साथी । आवत जावत पांव घिसा रे, (वा'ला) अखियां भई राती । कागद लै राधा बांचण बैठी, भर आई छाती । नैन नीरज अब बहै, (वा'ला) गंगा बहि जाती । पानां ज्यूं पीली पड़ी रे, (वा'ला) अन्न नही खाती । हरि बिन जिवड़ो यूँ जलै रे, (वा'ला) ज्यू दीपक संग बाती । साचां कुछ चकोर चंद, धोलै बहि जाती । ब्रज नारी की बिनती रे, (वा'ला) राम मिले मिलजाती । मनै भरोसा राम को रे, (वा'ला) डूबत नार्यै हाथी । दास मीरां लाल गिरधर, सांकड़ारो२ साथी । ॥२७०॥† इस पद मे जगह जगह 'हरि' शब्द का प्रयोग हुआ है। 'हरि' शब्द के बदले कही 'राम' और कही 'कृष्ण' प्रयोगयुक्त पाठान्तर भी मिलते है। 'रे', 'वा'ला', 'जी' आदि शब्दो का प्रयोग अधिकांश राजस्थानी लोक-गीतो मे होता है। लय की पूर्ति ही इनका एकमात्र उदेश्य है। पद के प्रारम्भ मे ऊधव के पत्र लेकर आने का वर्णन है, परन्तु शेष पद मे ऊधव की कोई चर्चा नही है। पद विचारणीय है। १२ रावलौ बिडद मोहि रूड़ो३ लागे, पीड़ित पराये प्राण । सगो सनेही मेरो और न कोई, बैरी सकल जहान । ग्राह गह्यो गजराज उबार्यो, बूड न दियो छै जान४ । मीराँ दासी अरज करत है, नाही जी सहारो आन । ॥२७१॥ 'बैरी सकल जहान" जैसी अभिव्यक्ति विचारणीय है। तयाकथित मीराँ के पदों मे यही एक पद ऐसा है जिसमें 'हारे को हरिनाम' जैसी भावना व्यक्त होती है। १ कौन, २ बुरे दिन, ३ अच्छा, ४ ब़ारात ।