भारतकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १८९ और तीनो पर ही सत मत का प्रभाव विशेष रूप से स्पष्ट हो उठा है । यह पद उपर्युक्त दोनो पदो (स० ३०२ और ३०३) के सम्मिश्रण से बना हुआ एक नया रूपान्तर मात्र प्रतीत होता है ।) *१४ सांवरे रग राची, राणाजी हू तो । बाध घूघरा प्रेम का, हू हरि आगे नाची । एक निरखत है एक परखत है, एक करत मोरी हासी । और लोग म्हारो काई करसी, हू हरि जी की दासी । राणो विष को प्यालो भेज्यो, हू तो हिम्मत काची । मीराँ चरणा लाग रही छै, साची ॥३०५॥ यह पाठ पहले चार पाठो के ही अधिक निकट पडता है। इसकी भाषा मिश्रित है तथापि राजस्थानी की ओर ही विशेषत झुकी हुई है। भावाभिव्यक्ति मे एक नूतनता है, “हू तो हिम्मत की काची” । जैसी अभिव्यक्ति अन्य प्राय प्राप्त पदो मे मीराँ पीवत हासी” जैसी अभिव्यक्ति के विरुद्ध पडती है। विभिन्न पदो का सम्मिश्रण ही इस पद का आधार प्रतीत होता है । १५ राणाजी हो मै साधुन रग राती । काहू को पिया परदेस बसत है, लिख लिख भेजती पाती । मेरो पियो मेरे माहि बसत है, कहि न सकूँ सरमाती । सहो कसूमी ओढ दुपट्टी, झुरमुट खेलन जाती । झुरमुट खोल मिले यदुनन्दन, खोल मिली मिल साती । और सखी मद पीवन भाई, मै मद की मदमाती । मै मद पियो पचवटी को, छकी रहूँ दिन -राती । सुन्न सिखर के द्वारे आके, मोहि मिले अविनासी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जनम जनम की दासी ॥३०६॥