मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह भौ सागर अति जोर कहिए, अनत उडी बार। राम नाम का बाध बड़ो उतर परले पार। ज्ञान चोसर, मडी चोहट्ट, सुरत पासा सार। या दुनियाँ मे रची बाजी, जीत भावै हार। साधु सन्त महन्त ज्ञानी, चलत करत पुकार। दास मीराँ लाल गिरधर, जीवणाँ दिन च्यार। ॥३१४॥ पाठन्तर १, नहि ऐसो जनम बारम्बार। क्या जानूँ कुछ पुण्य प्रगटे, मानुषा अवतार। बढ़त पल पल, घटत छिन छिन, जात न लागे बार। बिरछे के ज्यूँ पात टूटे, लगे नहि पुनि डार। भव सागर अति जोर कहिए‘ विषम औखी धार। सुरत का नर बाध बेड़ा, बेग उतरो पार। साधु सन्ता ते गहन्ता, चलत करत पुकार। दासी मीराँ लाल गिरधर, जी वणो दिन चार। उपर्युक्त पद सूरदास जी के पद का ही गेय रूपान्तर प्रतीत होता है (देखिये “मीराँ, एक अध्ययन”)। पाठान्तर पर सन्त-मत का प्रभाव स्पष्ट है। २४ यहि विधि भक्ति कैसे होय। मन की मैल हिये से न छूटी, दियो तिलक सिर धोय। काम कूकर लोभ डोरी, बाधि मोहि चडाल। क्रोध कसाई रहत घट मे कैसे मिले गोपाल। बिर्लार विषया लालची रे, ताहि भोजन देत। दीन हीन ह्वै क्षुधा तरसै, राम नाम न लेत।