भारतकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १९३ २१ मन रे परसि हरि के चरण। सुभग सीतल कवल कोमल, त्रिविध ज्वाला हरण। जिण चरण प्रहलाद परसे, इन्द्र पदवी धरण। जिण चरण ध्रुव अटल कीन्हे, राखी अपनी शरण। जिण चरण ब्रह्मांड प्रभु परसि लीणो, तरी गौतम धरण। जिण चरण काली नाग नाथ्यो, गोपी लीला करण। जिण चरण गोबरधन धार्यो, इन्द्र को गर्व हरण। दासी मीराँ लाल गिरधर, अगम तारण तरण। ॥३१२॥ पद की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा है। अत प्रत्येक पंक्ति का प्रथम शब्द “जिण” न होकर “जिन” होना ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। २२ मै तो तेरी सरण परी रे, राम, ज्यूँ जाणे ज्यूँ तार। अड़ेसठ तीरथ भ्रमि भ्रमि आयो, मन नाहि मानि हार। या जग मे कोई नही आपणा, सुणियौ श्रवण मुरार। मीरां दासी राम भरोसे, जग का फंदा निबार। ॥३१३॥ पद की तृतीय पंक्ति का उत्तरार्द्ध अर्थहीन है। बहुत सम्भव है कि “सुणियौ कृष्ण मुरार” पाठ हो। ऐसा होने पर सम्बोधन की पुनरुक्ति अवश्य हो जाती है, तथापि अर्थ संगति बैठ जाती है। २३ नहि ऐसो जनम बारम्बार। का जाणूँ कुछ पुण्य प्रगटे, मानुसा अवतार। बढत छिन छिन घटत पल पल, जात न लागे बार। बिरछ के ज्यूँ पात टूटे, बहुरि न लागे, डार। १३