मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“दासी” और “जन” प्रयोग युक्त पद १६७ २८ सखी री लाज बैरन भई। श्री लाल गुपाल के संग्, काहे नाहि गई। कठिन क्रूर अकूर आयो, साजि रथ कँह नई। रथ चढाय गोपाल लैगी, हाथ मीजत रही। कठिन छाती स्याम बिछुरत, बिरह मे तन तई। दास मीराँ लाल गिरधर, बिखरे क्यो ना गई ॥३१९॥† २९ सखी मोहे लाज बैरन भई। चलत गुपाल लाल पिय के, सग क्यो ना गई। चलन चाहत गोकुल ही ते, रथ सजायो नई। बिरह व्याकुल होय सजनी, हाथ मल मल रही। कठिन छाती स्याम बिछुरत, बिदर क्यो ना गई। लेन अब संदेश पिय को, काहे पठऊँ दई। कूबरी संग प्रीति कीन्ही, मोहे माला दई। दास मीराँ लाल गिरधर, प्रान दछना दई। ॥३२०॥ पद की चतुर्थ और छठी पक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर मिलतेहै। चतुर्थ पंक्ति . “रुकमनी संग जाइबे को, हाथ मीजत रही।” छठी पक्ति . “तुरत लिखि संदेस पिय को, काहि पठऊँ लई।” दोनो ही पाठो मे “दास मीराँ” प्रयोग मिलता है, यह विचारणीय है। ३० अब तो हरि नाम लौ लागी। सब जग को यह माखन-चोरा, नाम धर्यो बैरागी।