मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २१९ मन डूबत लीला सागर मे, देही प्रीति धरी। गुरु सतन की मोहनि सूरति, उर बिच आई अरी। मीराँ के प्रभु हरी अविनासी, सरणौ राखि हरी ॥३६०॥ वैष्णव और सतमत दोनो का ही प्रभाव स्पष्ट है। ८ डब्बा मे सालगरम बोलत क्यो नहियाँ। हम बोलत तुम बोलत नाहि, काहे को मौन धरैयाँ। यह भव सागर अगम भरी है, काढ़ लेहूँ गहि बैयाँ। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, तुम्ही मोरे सैयाँ ॥३६१॥† पदाभिव्यक्ति असगत है। ९ तुम बिन स्याम कौन सुने (गो) मेरी। ठाढी खेवटणी अरज करत है। मलवा ने नाव पच्छिम फेरी। नदिया गहरी नाव पुराणी। अध पर बीच भंवर ने घेरी। बोदी है प्रभु पार लगावो। डूब जाय तो कहा रहै तेरी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर। कुल को त्याग शरण लिईं तेरी। ॥३६२॥† पदाभिव्यक्ति स्पष्ट नही है। १० काहे को देह धरी, भजन बिन काह को देह धरी। गर्भवास की मास ृदिखाई, बाकी पीव लुरी।