मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह कोल¹ बचन कर बाहर आयी, अब तुम भूल परी। नीब तन गारा बजे बधाई, कुटुंब सब देख डरी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जननी भार मरी ॥३६३॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति नही है। ११ अब कोऊ कछु कहो दिल लागा रे। जाकी प्रीत लगी लालन से, कचन मिला सुहागा रे। हसा की प्रकृत हसा (ही) जाने, का जाने मर कागा रे। तन भी लागा, मन भी लागा ज्यो बाभण गल धागा रे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भाग हमार जागा रे ॥३६४॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। पद मे पूर्वापर सबन्ध का भी निर्वाह नही हुआ है। सघर्ष द्योतक पदो मे भी एक पद ऐसा ही मिलता है। बहुत सम्भव है कि यह पद उसका गेय रुपान्तर मात्र हो। १२ करम की गति न्यारी सन्तो, करम की गति न्यारी। बडे बडे नयन दिये मरधन कु, बन बन फरत उघारी रे। उज्वल वरन दीनी बगलन कु, कोयल कर दीनीकारी रे। औरन दीपन जल निरमल कीनो, समुदर कर दीनी खारी रे। मुरख कु तुम राज दियत हो, पण्डित फरत भिखारी रे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागुन राना जी तो कान बिचारी रे। ॥३६५॥ १३ भजन भरोसे अविनाशी, मै तो भजन भरोसे अविनाशी। जप तप तीर्थ कछुए न जाणुँ फरत मे उदासी रे। १ कौल, बचन।