मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
२२० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह कोल¹ बचन कर बाहर आयी, अब तुम भूल परी। नीब तन गारा बजे बधाई, कुटुंब सब देख डरी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जननी भार मरी ॥३६३॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति नही है। ११ अब कोऊ कछु कहो दिल लागा रे। जाकी प्रीत लगी लालन से, कचन मिला सुहागा रे। हसा की प्रकृत हसा (ही) जाने, का जाने मर कागा रे। तन भी लागा, मन भी लागा ज्यो बाभण गल धागा रे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भाग हमार जागा रे ॥३६४॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। पद मे पूर्वापर सबन्ध का भी निर्वाह नही हुआ है। सघर्ष द्योतक पदो मे भी एक पद ऐसा ही मिलता है। बहुत सम्भव है कि यह पद उसका गेय रुपान्तर मात्र हो। १२ करम की गति न्यारी सन्तो, करम की गति न्यारी। बडे बडे नयन दिये मरधन कु, बन बन फरत उघारी रे। उज्वल वरन दीनी बगलन कु, कोयल कर दीनीकारी रे। औरन दीपन जल निरमल कीनो, समुदर कर दीनी खारी रे। मुरख कु तुम राज दियत हो, पण्डित फरत भिखारी रे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागुन राना जी तो कान बिचारी रे। ॥३६५॥ १३ भजन भरोसे अविनाशी, मै तो भजन भरोसे अविनाशी। जप तप तीर्थ कछुए न जाणुँ फरत मे उदासी रे। १ कौल, बचन।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २२१ मत्र ने जन्त्र कछुए न जाणुं बेद पढ्यो न गै काशी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल की हूँ दासी ॥३६६॥ १४ कोई ना जाने हरिया तारी गति कोई ना जाने। मिट्टी खात मुख देखा जसोदा चोदह भुवन भरिया। पडी पाताल काली नागनाथ्यूँ सूरन शशी डरिया। डूबत ब्रज राख लियो है कर गोबरधन धरिया। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर सरने आयो सो तरिया ॥३६७॥ १५ चरण रज महिमा मे जानी। ये ही चरण से गगा प्रगटी भगीरथ कुल तारी। ये ही चरण से विप्र सुदामा हरि कचन धाम दीनी। ये ही चरण से अहिल्या उधारी गौतम की पटरानी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर ये ही चरण कमल मे लपटानी ॥३६८॥ १६ मेरो मन हर लिनो राजा रण छोड़, राजा रण छोड़, प्यारा रंगीला रणछोड़ केशव माधव श्री पुरुषोत्तम कुबेर कल्याण कीजो। शंख चक्र गदा पद्म विराजे, मुख मुरली घन घोर। मोर मुकुट सिर छत्र विराजे, कुण्डल की छब ओर। आस पास रतनांगर सागर, गोमती जी करे कलोल। धजाँ पताका बहुत्याँ फरके, झालर फरत झकझोर। सब भगत के भाग्य ही प्रकटे, नाम धर्यो रणछोर। जे कोई तेरो नाम सुनावे, पावे युगल किशोर। मीराँ बाई के प्रभु गिरधर नागुण कर ग्रहो नन्द किशोर ॥३६९॥
२२२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह गुजराती में प्राप्त पद १ बोल माँ बोल माँ बोल माँ रे। राधा कृष्ण बिना बीजूँ बोल माँ¹। साकर शेलडीनो स्वाद तजी ने। कडवो लीवडो घोल माँ रे। चाँदा सूरजनु तेझ तजी ने। अगिया सगा ने प्रीत जोड माँ रे। हीरा माणेक झवेर तजी ने, कथीर सगाते मणि तोल माँ रे। मीराँ कहे प्रभु गिरधर नागर, शरीर आप्यु सम तोल माँ रे ॥३७०॥ २ ध्यान धणी केरू धरवूूँ² रे, बीजुँ³ पारे शुँ कहूँ। शुँ कहूँ रे सुन्दर श्याम, बीजाने⁵ मारे शुँ कहूँ। नित्य उठी शुभे नाहि अने धोई अने रे, ध्यान धणीतर्णु धरीए रे। साधु जन ने जमाडीओ⁴ वाला, जूठूं वधे⁶ ते अमे जभीए रे। वृन्द ते वन माँ राच्यो रे वाला, राम मडल माँ तो अमे रमीए रे। हरि ने चीर काम न आवे वाला, भगवाँ पहरीने अमे भभीए रे। बाई मीराँ के प्रभु-गिरिधर नागर, चरण कमल माँ चित धरीए रे। ॥३७१॥ पदाभिव्यक्तिमे वह गाम्भीर्य पूर्ण मधुरता नही जो मीराँ के पदो की विशेषता है। १ मत कर, २ धरना, ३ दूसरा, ४ भोजन करा कर, ५ दूसरे का, ६ बढे।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २२३ ३ राम नाम साकर कटका हॉ रे, मुख आवे अभी रस गटका। हॉरे जेने१ राम भजन प्रीत थोडी, तेनी२ जी मड़ली लियो ने तोड़ी। हॉरे जेने राम तना गुण गाया, तेने जमुना मार न खाया। हॉ रे गुण गाये छे मीराँ बाई, तुम हरि चरने जाओ धाई। बोल माँ बोल माँ बोल माँ रे, राधिका सुन बिन बोल माँ रे। साकर सेरड़ी स्वाद तजी ने, कड़वो लिवड़ो३ घोल माँ रे। चान्दा सूरजने तेज तजी रे, आगिया सधाथे प्रीत जोड माँ रे। हीरा माणक जेवर तजी ने, कथीर सधा थे मनी तोल माँ रे। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सरीर आप्यूँ समतोल माँ रे ॥३७२॥† उपर्युक्त पद का प्रथमांश "राम नाम जाओ धाई। अभिव्यक्ति के आधार पर प्रक्षिप्त ही प्रतीत होता है। द्वितीयांश "बोल माँ रे प्रीत जोड माँ रे।" प्रथम पद (स० १) की ही पुनरुक्ति है। ऐसे पद निश्चित रूप से प्रक्षिप्त कहे जा सकते है। ४ मुझ अबला ने मोटी नीरात थई सामलो घरे, तु म्हारे साँचुरे। खाली धडाऊँ बीटलबर केरी, हार हरिनो म्हारे हिय रे। तीन माल चतुर भुज चुडलो, सिद्ध सोयी धरे जाइये रे। झाझरिया जगजीवन केरा, किसन गला री कठी रे। बिछुवा घुँघरा रामनारायण, अनवट अन्तरजामी रे। पेटी घड़ाऊ पुरुषोतम केरी, ने टीकम नाम नूं तालो रे। कुञ्जी कराऊँ .करुणा नन्द केरी, ते मा गैषा नू माँरू रे। सासर बासो सजी ने बैठी, अब नथी४ काँचू रे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि नु चरणे जाचू रे। ३७३।।† १ जिसको, २ उसकी, ३ नीम, ४ नही।
२२४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ५ मुखडानी माया लागी रे, मोहन प्यारा, मुखडानी माया लागी रे। मुखडूँ मै जोयूँ१ त़ासूँ सर्व जग थे यूँ२ खारूँ, मन मारूँ, रहियूँ न्यारूँ रे। संसारी नो सुख एवो३ झाझवाना नीरं जे बूँ४, तेने तुच्छ करी फेरिये रे। ससारी नो सुख काचूँ, परणी ने रड़ावु पाछूँ, तेने घर सीद५ जइये रे। परणूँ तो प्रीतम प्यारो, अखण६ सौभाग्य मारो, राण्डवानो भय टाल्यो रे। मीराँ बाई बलिहारी आशा मूने एक तारी, हवे७ हूँ तो बड भागी रे। ॥३७४॥† ६ काम नही आवे तो काम नही आवे प्रभु बिना तुम्हारे काम नही आव। खचि खचि अन्न वो भोजन बनायो, तापरे तन तापकर लगायो रे। रत्न जतन करि एहि पुतर जायो, छनो छनो बाबु लाड लडायो रे। तिरया कहे तोरे साथ चलूँगी, लुटि लुटि वाको धन खायो रे। काढ काढ करे घर की बाहरी छनुरे रहेवा न पाया रे। बाई मीराँ थे प्रभु गिरधर नागुण, चरणे रही चरण न धरायो रे। ॥३७५॥† ७ हाँ रे चालो डाकोर माँ जई बसिये। हाँ रे मने रग लगाडी रग रसिये रे। हाँ रे प्रभात ने पहोर माँ नोबत बाजे। हाँ रे अमे दरसन करवा जइये रे। हाँ रे अटपटी पाग केसरियो बाधो रे। हाँ रे काने कुण्डल सोइये रे। हाँ रे पीला पीताम्बर जरकस जामा। १ देखा, २ हुआ, ३ ऐसा, ४ जैसा, ५ उसको, ६ अखड ७ अब।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २२५ हाँ रे मोतियन माल थी मोहिये रे। हाँ रे चन्द्र बदन अनियाली आँखो। हाँ रे मुखड़ो सुन्दर सोहिये रे। हाँ रे रूमझूम रूमझूम नूपूर बाजे। हाँ रे मन मोहियो मारू मोर लिये रे। हाँ रे मीराँ बाई कहे रे गिरधर नागर। हाँ रे अगो अंग जाई मलिये रे ॥३७६॥† उपर्युक्त पद गुजराती गरबा गीतों की तर्ज पर है। ८ सोकल डानूं साल भरि भोटूँ हो जीरे घरमाँ सो कलडानूं साल मोरे। हेमो ने हमारे मइयर बनावो वोला, हवे रहेवानूं म्हाने खोटु। कुबेरे पडीसुँ अभो वखडोर पीसूं, हावे जीवा ने आल सिर चोटु। सासु हठीली ननद ढगारी वाला, नाना दिये रर्युं मे यूँ मोटु। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर वाला, चरण कमल चितने ओठु ॥३७७॥† ९ लेताँ लेताँ राम नाम रे, लोकड़याँ तो लाज मरे छे। हरि मन्दिर जाता पाव लिया रे दूखे, फिरि आवे सारो गाम रे। झगडो थाय त्यॉ दौड़ी ने जाय रे, मुकी ने घर ना काम रे। भाड गवैया गाने का नृत्य करताँ, बेसी रहे चारे जाम रे। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल चित हाम रे ॥३७८॥† १० हाँ रे मै तो की धी छै ठाकोर थाली रे, पधारो बनमाली रे वनमाली। प्रभु कंगाल तोरी दासी, हाँ रे प्रभु प्रेमना छो तमे प्यासी, दासी नी पूरजो आशी। प्रभु साकर द्राख खजूरी, माँहे न थी बासुरी के पुरी, मारे सासु नन्दनी सूली। १५
२२६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह प्रभु भाँत भाँत ना मेवा लावूँ, तमे पधारो वासु देवा मारे भुवन मा रजनी रेहवा। हाँ रे मे तो तजी छे लोकनी शका, प्रीतम का घर हे बका बाई मीराँ गे दीधा डका ॥३७९॥† ११ काये कूँ नलीयो तब तु कोय को न लीयो, रामजी को नाम तब तु काये को न लीयो। नव नव माँस तुँने उदर मे राख्यो, बड़ोरे भयो तबसे कुल लजायो। गुनका को बेटो गली माही डोले, पिता बिन पुत्र गुनका को कहायो। मीराँ बाई के प्रभु त्याहारा भजन बिना, आवो मनखोते ऐले गँवायो। ॥३८०॥† खड़ी बोली में प्राप्त पद १ मै तो हरि गुण गावत नाचूंगी। अपने महल मे बैठ कर प्रभु जी गीता भागवत बाचूँगी। ज्ञान ध्यान की गठरी बाध कर, हिरदे मन मे राखूँगी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सदा प्रेम रस चाखूँगी ॥३८१॥† अभिव्यक्ति के आधार पर पद को प्रक्षिप्त कहा जा सकता है। २ मालक कुल आलम के हो, तुम साँचे श्री भगवान। स्थावर जगम पावक पाणी, धरती बीच समान। सब मे जलवा तेरा देखा, कुदरत के कुरबान। सुदामा के दारिद खोये, बाले की पहिचान। दो मुट्ठी तंडुल की चाबी, श्राप भये रथवान।
५. मन्दिर-विहार, फाग व होली लीला
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २२७ उन ने अपने कुल को देखा छूट गये तीर कमान। ना कोई मारे ना कोई मरता, तेरा यह अज्ञान। चेतन जीवन तो अजर अमर है, यह गीता को ज्ञान। मुझ पर तो प्रभु किरपा कींजे, बन्दी अपनी जान ॥३८२॥† उपर्युक्त पद मीराँ विरचित है ऐसा आभास पद के किसी भी अंश से नही मिलता। “मीर माधो” के निम्नाकित पद से उपर्युक्त पद की तुलना करने पर यह सुस्पष्ट हो जाता है कि “मीर माधो” का ही पद मीराँ के नाम पर चल पड़ा है। मालक कुल आलम के हो साँचे श्री भगवान ' स्थावर जगम पानी पावक, धरती बीच समान। सब मे जलवा तेरा देखा, कुदरत के कुरबान। सुदामा के दारिद खोये, पाडे की पहचान। दो मुट्ठी तडुल की चाबी, बख्शे दो जहान। भारत मे अर्जुन की खातर, आप भये रथवान। उसने अपने कुल को देखा, छूट गये तीर कमान। ना कोई मारे ना कोई मरता, तेरा ही अजान। यह तो चेतन अजर अमर है, यह गीता को ज्ञान। मुझ अज्ञान पर किरपा कीजे, बन्दा अपना जान। मीर माधो मै शरण तिहारी, लागे चरनन ध्यान ॥३८३॥ (बृहद्राग रत्नाकर, पृ० १७७, पद १३८) । ३ कछु लेना न देना मगन रहना। नाय किसी की काणा सुनवी, नाय किसी को अपनी कहना। गहरी गहरी नदिया नाव पुरानी, खेवटिये सूं मिलते रहना। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, साँवरा के चरण मे चित देना ॥३८४॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वपर संगति का अभाव है।
२२८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह मीराँ को प्रभु सांची दासी बनाओ। झूठो धंधो से मेरा फ़ंदा छुडाओ। लूटे ही लेत विवेक का डेरा। बुधि बल यदपि करु बहुतेरा। हाय राम, नहि कछु बस मेरा। मरत हू विवस प्रभु धाओ सबेरा। धर्म उपदेश नित प्रति सुनती हू। मन कुचाल से भी डरती हूं। सदा साधु सेवा करती हू। सुमिरण ध्यान मे चित धरती हू। भक्ति मार्ग दासी को दिखाओ। मीराँ को प्रभु साची दासी बनाओ ॥३८५॥† भाषा के आधार पर पद की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध है। विभिन्न बोलियों में प्राप्त पद १ बन्दे बन्दगी मत भूल। चार दिना की कर ले डूबी, ज्यूँ पाडिभरा फूल। आया था ए लोभ के कारण, भूल गमाया मूल। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, रहना वे 'हजूर। ॥३८६॥† उपर्युक्त पद में ब्रज और पंजाबी भाषा का अजीब सम्मिश्रण है। अन्तिम पंक्ति का द्वितीयांश 'रहना वे हजूर' भी अर्थ हीन ही प्रतीत होता है। पंजाबी भाषा के प्रभाव के कारण पद की प्रामा- णिकता विशेष संदिग्ध है।
वैष्णव प्रभाव द्योतक पद पौराणिक गाथाएँ राजस्थानी में प्राप्त पद १ क्यूँ कर म्हे दिन काटा (नाथ जी), थे तो म्हांसू अतर राखो (नाथ जी) राखो क़पटी आंटा। कुबज्या दासी कस राइं की, फिरती कपड़ा फाटा, वाकू तो पटरानी कीन्ही पहरे रेसम पाटा। बाजूबन्द मूंदडी अंगुली नखसिख गहणों साटा, पहर¹ कुबड़ी न्हावण चाली जमुन के घाटां। धान न भावै नीद न आवै, चिन्ता लगी निराटा, मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, देख देख हियो फाटां। ॥३८७॥† २ दूर रहो रे कवर नदना रे, परे² रह रे कवर नदना रे। कारी कामरी वारा तू रे कान जी ओ, थे तो रीझ्या³ सालूड़ा⁴ री कोर जी ओ । गज मोत्यां⁵ वारी राणी राधिका जी रे, श्री राधा गोरी ज्याको नाम छै रै । १ पहन कर, २ दूर, ३ मोहित हो गये, ४ओढ़नी, ५मोती का राजस्थानी बहुवचन।
२३० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह 'बाला हाथ जोडी ने करा बीनती रे, म्हारो अबला को कह्योड़ो १ जादू मानजो रे। मीराँ मेडतणी रा म्हैला उभयिया रे, मै तो रीझ्या रीझ्या साधूङा री साथ मे रे ॥३८८॥† यह पद राजस्थानी लोक गीतों की लय पर ही है। श्री सूर्यकरण जी चतुर्वेदी जी के अनुसार भी इसकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। ३ रुक्मणी री लाज राखो, राखोला म्हांराजी। आजि रुक्मण की लाज राखो। माता के मै र्घणि पियारी, नाही दोष पिता को। रुकभइयौ सिसुपाल बुलायो, नही मुख देखूँ वाको। थाका बिडद कूँ लोग हसैगो, जीव जावेगी म्हाको। मेरा स्याम कूँ कृष्न बतावै, नारद मूनीयो भाषो। मीराँ कहे यूँ रुक्मणी कहत है, ऊँच नीच मति राखो। ॥३८९॥† ४ माधो जी, आया ही सरैगो, राणी रुक्मण का भरतार। लिखी पतिया द्विज हाथ पठावो, द्वारका ने गमन करैगी। बडे बडे भूल महाबल जोधा, कुण से कोण घटैगी। यो सिसपाल चंदेरी को राजा, कूडी साँख भरैगी। मीराँ कहै यूँ रुक्मणी कहत है, योको ही बिड़द लजैगी। ॥३९०॥† १ कहा हुआ।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३१ प्रसिद्ध है कि मीराँ ने रुक्मणी मगल नामक एक ग्रथ की रचना भी की थी, परन्तु अभी तक इस ग्रथ की उपलब्धि नही हुई है। श्री सूर्य- करण जी चतुर्वेदी का मत है कि उपर्युक्त दोनो पद सम्भवत उसी ग्रथ - के अश हो। सम्पूर्ण ग्रंथ के अप्राप्य होने के कारण मात्र दो चार पदो के आधार पर इस सबध मे कोई निर्णय देना सभव नही। ५ मत आवै रे नन्द का म्हांकी गली। म्हाकी गली की बाकी गुवालिन, मत ना लोग हँसावै रे। सासु बुरी मेरी नणद हठीली, पाडोसण¹ लख जावै२। कोऊ गलियो मे लुकतो छिपतो म्हांके कामी आवै रे। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, झूठो ही ललचावै रे ।।३९१।।† ६ म्हासूं मुखड़ै क्यूँ नहि बोली। म्हासूं काईं गुना लियो छै अबोले। पहली प्रीति करी हरि हम सूं, प्रेम प्रीति को झोलो। प्रेम प्रीति की गांठना धुलि गई, याने कुण विधि खोलो। कुब्जा दासी कसराय की, अक भरि भरि तोलो। मीराँ के प्रभु कबर मिलोगे, हिवडा री गांठवा खोलो ।।३९२।।† ७ मोहन मुसक्याने सखी लागे सोही जाणे। मै जल जमुना जात वृन्दावन वो पीछे से आयो। १ पडोसी स्त्रियाँ, २ लख जावे, भाँप लेना।
२३२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह . काकरी दे मोरी गगरी गिराई, जोरी से बैया मरोरी । सखी कोई रीत न जाणे । मै दधि बेचन जात वृन्दावन वो सामे से आयो । दधि की मटकी सिर से गिराई लूट लूट दधि खाणे, सखी कोई मरम न जाणे । घायल की गति घायल जाणे, जे कोई निकसे जाणे । मीराँ को कह्यो बुरा न मानो, आखिर जात अहीर । सखी ये प्रीत न जाणे ॥३९३॥† पद के तीसरे अंश का शेष पद से समन्वय नही होता। श्री सूर्य- करण चतुर्वेदी जी के मतानुसार भी यह पद मीराँ का प्रतीत नही होता। ८ नन्द जी रे आज बधावणो छै । गहमह हुई रंग रावल मै, निरखि नैना सुख पावनो छै । भाभी जी, म्यो था सूं पूछां, आजिरो द्योस सुहावणो छै । मीराँ के प्रभु गिरिधर जनमिया, हुवो मनोरथ भावनो छै। ॥३९४॥† ९ हे री माँ नन्द को१ गुमानी, म्हारे मनडे बस्यो । गहे दुम डार कदम की ठाढ़ो, मृदु मुस्काय म्हारी ओर हंस्यो । पीताम्बर फटि काछनी काछे, रतन जटित माथे मुकुट कस्यो । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, निरख बदन म्हारो मनडो फस्यो । ॥३९५॥ १ नन्दा का पुत्र, 'नन्द को', 'नन्द का' आदि प्रयोग राजस्थानी भाषा की शैली मे प्राय प्राप्त होते हैं,
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३३ १० कुछ दोष नहि कुबज्या ने, बीर२ अपना श्याम खोटा । आप न आवे पतियाँ न भेजे, कागज का कोई टोटा । नौ लख धेनु नन्द घर दूंधे, माखन का नही टोटा । आप ही जाय द्वारिका छाये, ले समदर३ की ओटा । कुबज्या दासी नन्दराय की, वे नन्द जी के ढोटा । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, कुबज्या बडी हरी छोटा । ॥३९६॥† एक निम्नांकित ऐसा ही पद 'चन्द्रसखी' के नाम पर भी प्रचलित है। कुछ दोष नही कुबज्या ने, वीर आफ्नो स्याम खोटो । आप न आवे पतियाँ न भेजे, कागद रो काईं टोटो । बिख बेल रे बिख् फल लागे, काई छोटी काईं मोटो । जमना के नीरे तीरे धेन चरावे, हाथ चन्दन रो सोटो । कुबज्या चेरी कस राय री, वो छै नन्दजी रो ढोटो । इस पद मे 'चन्द्रसखी' की छाप नही है तथापि यह 'चन्द्रसखी'के सग्रह में ही प्राप्त है। पदाभिव्यक्ति देखने से प्रतीत होता है कि गेय परम्परा के कारण विभिन्न पदाश सग्रहीत होकर एक स्वतन्त्र पद के रूप मे चल पड़े हैं। ११ हमने सुणी छै हरि अधम उधारन । अधम उधारन सब जग तारण । गज की अरजि गरजि उठि ध्यायो, संकट पर्यो तब निवारण । द्रोपति सुता को चीर बढायो, दुसासन को मान पद मारण । प्रल्हाद की प्रतग्यां राखी, हरणाकुस नख इन्द्र विदारण । २ भाई, ३ समुद्र ।
२३४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह रिख पतनी पर कृपा कीन्ही, विप्र सुदामा की विपति विदारण। मीराँ के प्रभु मो बदि पर, एती अंबेरी भई किण कारण। ॥३९७॥ १२ म्हा नैणा आगे रहीजो जी स्याम गोविन्द। दास कबीर घर बालद जो लाया, बासदेव का छान छबन्द। दास धना को खेत निपजायो, गज की टेर सुनन्द। भीलणी का बेर सुदामा का तदुल, भर मूठडी, बुकन्द। करमी बाई को खीच आरोग्यो१, होइ परसण पाबन्द। सहस गोप बीच स्याम बिराजै, ज्यो तारा बिच चन्द। सब संतो का काज सवाँरे, मीराँ सूँ दूर रहन्द। ॥३९८॥ उपर्युक्त दोनो पद इस श्रेणी के अन्य पदो से अलग पड़ते है, क्योकि इनमे निर्वेद की भी भावना झलकती है। इस पद मे प्रयुक्त 'मीराँ 'सूँ दूर रहन्द' जैसी टेक भी अन्य पदो मे प्राप्त नही। मिश्रित भाषा में प्राप्त पद १ राम गरीब निवाज, मेरे सिर राम गरीब निवाज। ऋचन कलस सुदामा कूं दीनो, हींडत है गजराज। रावण के दस मसतग छेदे, दीयो भभीखण् राज। द्रोपती सती को चीर बंधायो, अपणे जन के काज। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, कुल की राखी लाज ॥३९९॥ १ खाया।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३५ २ किरपा भई सतगुर अपने की बेर बेर, हरि नाँव१ लियो री। हिरणाकुस प्रल्हाद सतायो, जार अगन बिच डाल दियो री। राज छाँड दियो नाँव न छाँड़ियो, खम्भ फाड़ प्रभु दरस दियो री। माता को उपदेस भयो जब, राज छाँड धुजी बन मे गयो री। मारग मे मिल गए नारद मुनि, तब से धुजी अटल भयो री। सागर ऊपर सिला तिराई, दुष्ट रावण कूँ मार लियो री। सीता सहित अवधपुर आयै, भगत बिभीषण राज दियो री। सब भगतन की सहाय करी प्रभु, मेरी बेर कहाँ सोय गयो री। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बसी बजा के मोहि लियो री। ॥४००॥† पद के प्रथम पंक्ति से सतमत का प्रभाव स्पष्ट हो उठता है, परन्तु शेष पद से वैष्णव प्रभाव ही स्पष्ट लक्षित होता है। ३ प्रीत मत तोडो गिरधर लाल। तुम ही साहुकार तुम ही बोहोर, ब्याज भूल मत जोडो। साँवरियाँ के कारणे मै तो बाग लगायो, काचा कलियाँ मत तोडो। साँवरियाँ के कारण मे तो सेज बिछाई, सूनी सेज मत छोड़ो। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, इमरत मे विष मत घोरो। ॥४०१॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबध का निर्वाह नही हुआ है। श्री सूर्यकरण जी चतुर्वेदी के मतानुसार भी यह पद मीराँ विरचित नही प्रतीत होता। १ नाम।
२३६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह ४ नन्द को बिहारी म्हारे हियडे बस्यो छै। कटि पर लाल काछनी काछे, हीरा मोती वालो मुकुट धर्यो छे। गहिर ल्यो डाल कदम की, ठाडी गोहज मो तन हेरि हस्यो छे। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, निरखि दृगन मे नीर भर्यो छे। ॥४०२॥† पद की तृतीय पंक्ति सर्वथा अर्थहीन है। ५ मिथुला, कर पूजन की त्यारी। धूप दीप नैवेद्य आरती, सबही सौज लेआ री। बहु विध सूं पंकवान बनाकर, करो भोग की त्यारी। जीमेली१ म्हारो पिया गिरधारी, साधां ने बेग बुला री। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर चरणा पर बलिहारी। ॥४०३॥ पाठान्तर १, मिथुला, सुन यह बात हमारी। राज भोग की समै३ हुई है, बेग२ थाल सजला री। छप्पन भोग छतीसो विजन, सीतर जल की झारी। धूप दीप नई वेद४ आरती, कीजे वेग त्यारी। धरिये भोग विलम्ब नही कीजिये, मेरी मान पियारी। जीमे म्हाँरो प्यारो गिरधर, साधा ने बेग बुलारी। उपर्युक्त पद विशेष विचारणीय है। किसी अन्य को आज्ञा देकर पूजन की त्यारी करने की अभिव्यक्ति इस पद की विशेषता है। यहाँ “मिथुला” सम्बोधन भी किस के प्रति हुआ है यह एक विचारणीय प्रश्न है। १ भोजन करेगा, २ शीघ्र, ३ समय, ४ नैवेद्य।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३७ ६ मन मोह्यो रे बसीवाला। काँधे कमरिया हाथ लकुटिया, मारियो नैना के भाल। यक बन ढूँढी सकल बन ढूँढे, कहूँ नही पायो नन्दलाल। मोर मुकुट पीताम्बर राजे, कानन कुडल छबी बिसाल। मीराँ प्रभु गिरधर जू की प्यारो, आनि मिल्यो प्यारी गोपाल। ॥४०४॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सम्बन्ध का निर्वाह नही हुआ है। ७ वाह वाह रे मोहन प्यारे, कहाँ चले जादू करि के। रुप सरूप सलोनी सी डारी, मेरो मन लीनू हर के। मोर मुकुट सिर छत्र बिराजै, नख पर गिरवर धर के। दमन कियो नाग काली को, आप घुसे मघ सर के। फण फण निरत करत यदुनन्दन, अमै कियौ बग बद के। सब ब्रजलोग छाँडि निज घरकूँ, जाई बसे तर गिर के। सात दिवस लग सूँड धार, जल इन्द्र पखो पग डर के। कातिग¹ मास बाल सब मिल कै, नाचै जल मे तिर के। चोर चोर पुनि बगल डार कै, जाय चढ़े छल करि के। वृन्दावत की कुज गलिन मे, रास रच्यो छल बल के। मीरां के प्रभु हरि अविनासी, पानै पडी गिरिवर के ॥४०५॥ पदाभिव्यक्ति असंगत है। ८ पाछो रथ फेरो द्वारका रारा। सूरज तलफे चदा तलफे, तलफे. नोलख तारा। १ कार्तिक।
२३८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
गऊ भी तलफे बाच्छा भी तलफे, तलफे गुवाल बिचारा। जोगी भी तलफे जगम भी तलफे, तलफे समदर खारा। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, तुम जीते हम हारा ॥४०६॥† ऐसी पदाभिव्यक्ति अन्य पदो से सर्वथा भिन्न पडती है। अन्तिम पंक्ति और शेष पद मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह भी नही हुआ है। ९ मैया ले थारी लकरी, ले थारी कांवरी, बछिया हू न जाऊ री। सग के ग्वाल बाल सब बलिभद्र कूं मोकलो। ⁃ एकलो बन मे डराऊ री। सघन बन मे कछु खबर नहि परे। सग के ग्वाल सब मोहे डरावे रे। दादुर मोर पछी यूं रटे, कृष्ण कृष्ण कहि मोहि खिजावे। माखन तो बलिभद्र को खिलायो, हमको पिलाई खाटी छाछडी। वृन्दावन के मारग जातां, पाऊ¹ मे चेभत झीनी काकरी। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कवल तोरी आँख री॥४०७॥† उपर्युक्त पद का भाषा और भाव के आधार पर गुजराती पदो से गहरा समन्वय है। गुजराती भाषा का प्रभाव भी स्पष्ट है। प्रथम अर्द्धांश की भावाभिव्यक्ति का सूरदास के पदो से गहरा साम्य है। पद की छठी पंक्ति का शेष पद से पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही होता। अन्तिम पंक्ति द्वितीयार्द्ध सर्वथा अर्थविहीन है। ऐसे पदो को गेय परम्परा का फल मानना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है। १० आज अनारी ले गयो सारी, बैठी कदम के डारी हो माय। म्हारी गैल² फर्यो गिरधारी, हे भाय आज अनारी ले गयो सारी।
१ पैर, २ पीछे।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३९ मै जल जमुना भरन गई थी, आगयौ कृष्ण मुरारी हे माय । ले गयो सारी अनारी हॉररी, जल मे उभी उघारी हे माय । सखी साइनी मोरी हँसत है, हँसि हँसि दे मोहि तारी हे माय । सास बुरी अरु नणद हठीली, लरि लरि दे मोहि तारी हे माय । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल की बारी हे माय ॥४०८॥† ११ वाटड़ली निहारा जी हरि ठाढौ । आप नही आवत पतियाँ नाही मेलत, छाती करी हरि ठाढी¹ । इत गोकुल उत मथुरा नगरी, जमुना बहै छै नाडी । आप जाय मथुरा मे बैठे, प्रीत रली उहाँ बाढी । हम को लिखि लिखि जोग पठावत, आप दूलह कुबज्या भई लाढी² । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, कहा करै जमुना आडी । ॥४०९॥ लगभग ऐसे ही पद गुजराती भाषा के पदो मे भी मिलते हैं। अन्तिम पंक्ति का द्वितीयांश अर्थविहीन है। १२ मोरी गलियन मे आवो जी घनश्याम । पिछवाडे आए हेला³ दीजी, ललित सखी हे म्हारो नाम । पैया परत हूँ बिनती करत हूँ, मत कर मान गुमान । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तेरे चरण मे ध्यान । ॥४१०॥ १ कठिन, मजबूत, २ दूसरी पत्नी, ३ पुकार।