मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३५ २ किरपा भई सतगुर अपने की बेर बेर, हरि नाँव१ लियो री। हिरणाकुस प्रल्हाद सतायो, जार अगन बिच डाल दियो री। राज छाँड दियो नाँव न छाँड़ियो, खम्भ फाड़ प्रभु दरस दियो री। माता को उपदेस भयो जब, राज छाँड धुजी बन मे गयो री। मारग मे मिल गए नारद मुनि, तब से धुजी अटल भयो री। सागर ऊपर सिला तिराई, दुष्ट रावण कूँ मार लियो री। सीता सहित अवधपुर आयै, भगत बिभीषण राज दियो री। सब भगतन की सहाय करी प्रभु, मेरी बेर कहाँ सोय गयो री। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बसी बजा के मोहि लियो री। ॥४००॥† पद के प्रथम पंक्ति से सतमत का प्रभाव स्पष्ट हो उठता है, परन्तु शेष पद से वैष्णव प्रभाव ही स्पष्ट लक्षित होता है। ३ प्रीत मत तोडो गिरधर लाल। तुम ही साहुकार तुम ही बोहोर, ब्याज भूल मत जोडो। साँवरियाँ के कारणे मै तो बाग लगायो, काचा कलियाँ मत तोडो। साँवरियाँ के कारण मे तो सेज बिछाई, सूनी सेज मत छोड़ो। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, इमरत मे विष मत घोरो। ॥४०१॥† पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबध का निर्वाह नही हुआ है। श्री सूर्यकरण जी चतुर्वेदी के मतानुसार भी यह पद मीराँ विरचित नही प्रतीत होता। १ नाम।