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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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'१८ के गेय-रूपान्तर ही प्रतीत होते हैं, तो अन्य कुछ पदो मे शब्दावली भी हूबहू एक ही है। उपर्युक्त परिस्थिति मे यह कहना सम्भव नही कि कौन पद मौलिक रूपेण किसका है। इतने पर भी, 'चन्द्रसखी' के पदो मे प्राप्त "चन्द्रसखी भज बालकृष्ण छबि" जैसी टेक के आधार पर यह कहा जा सकता है कि 'चन्द्रसखी' की भक्ति वात्सल्य-भाव की ही थी। मीराँ अपनी माधुर्य-भाव की भक्ति के लिये ही प्रसिद्ध हुई। सम्भवत इस आधार पर कुछ पदो को छाँट लेने का प्रयास सफल हो सके। तथाकथित मीराँ के कुछ पदों से सतमत का प्रभाव विशेष रूपेण स्पष्ट हो जाता है। मतभेद, सघर्ष वियोग, आनन्द, समर्पण आदि सभी विभिन्न भावाभिव्यक्ति द्योतक पदो से भी सतमत का प्रभाव लक्षित होता है। 'दासी' और 'जन' प्रयोग युक्त पदो मे भी कुछ थोडे से पद सतमत से प्रभावित मिल जाते है। कुछ पदो मे मीराँ अपने गुरु का नाम रैदास बताती है। मुंशी देवीप्रसाद के आधार पर मीराँ को भोजराज की विधवा मान लेने पर मीराँ और रैदास दोनो के जीवन-काल मे लगभग सौ वर्ष का अन्तर पड जाता है। अत रैदास का मीराँ का गुरु होना सर्वथा ही असम्भव हो जाता है परन्तु मुशी देवीप्रसाद का कथन भी सर्वथा प्रामा- णिक नही सिद्ध होता। असम्भव नही कि मीराँ राव दूदा जी की पुत्री और राणा कुम्भ की ही राणी हो। जनश्रुतियाँ और पदाभिव्यक्तियाँ इसका समर्थन करती हैं तथा इतिहास सुनिश्चित न होते हुए भी विरोधा- त्मक नही। सर्व-मान्य है कि मीराँ का विरोध कृष्ण-पूजा के हेतु नही अपितु कुलमर्यादा के विरुद्ध पडने वाले साधु-समागम के कारण हुआ। अस्तु, अद्यावधि इन रचनाओ को निश्चित रूपेण प्रामाणिक या प्रक्षिप्त कहना युक्तियुक्त न होगा। फिर भी, प्रामाणिक पदो के छाँट लेने के लिये ही भाव-भाषा के आधार पर इनका विश्लेषण आवश्यक हो जाता है। राजस्थानी, ब्रज मिश्रित राजस्थानी, और ब्रज तीनो ही भाषाओ मे सतमत से प्रभावित पद प्राप्त होते हैं। संतमत मे प्रभावित शुद्ध ब्रजभाषा मे प्राप्त इन कुछ पदों की प्रामाणिकता विशेष संदिग्ध ही प्रतीत होती है। ऐसे अधिकांश पदो मे अर्थ-संगति और पूर्वापर सबध का अभाव है, फलत. उपर्युक्त सदेह को एक और समर्थन मिलता है। वैष्णव और सतमत से प्रभावित इस राणापरिवार मे एकलिंग और भवानी की पूजा का महत्व सदा ही अक्षुण्ण रहा। एकलिंग के पुजारी