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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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२५४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह ३० शिव के मन माँही बसी कासी। आधी काशी बामन बनिया, आधी कामी सन्यासी। काह करण को ब्राह्मण बनिया, काह करन को सन्यासी। नेम धरम को ब्राह्मण बनिया, तप करने को सन्यासी। कौन शिखर पर गौरी विराजै, कौन शिखर पर अविनासी। उत्तर शिखर पर गौरी विराजै, दक्षिण शिखर पर अविनासी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरी चरणन पर मै दासी। ॥४४०॥† उपर्युक्त पद की पाँचवी और छठी पक्तियाँ प्रथम पद की पाँचवी और छठी पक्तियो की पुनरुक्ति मात्र हैं। ३१ वे न मिले जिनकी हम दासी। पात पात विन्द्रावन ढूँढचो, ढूँढि फिरी सिगरी मै कासी। कासी को लोग बडो बिसवासी, मुष मे राम बगल मे फासी। आधी कासी मे बामण बनिया, आधी कासी बड़े सगसी। मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, हरि चरणा की रहो मै दासी ॥४४१॥† इस पद की तीसरी पंक्ति पद स० २८ की दूसरी पंक्ति की पुनरुक्ति ही प्रतीत होती है। “सगसी” कोई शब्द नही है। सम्भव है कि “सन्यासी” का ही अशुद्ध रूप चल गया हो। इन तीनो ही पदो को भाव और भाषा के ही आधार पर प्रक्षिप्त कहना ही उपयुक्त प्रतीत होता है। अभिव्यक्ति मे ही वह भावातिरेक और गाम्भीर्य नही है जो मीराँ के पदो की विशेषता है। प्राप्त अधिकांश पदो की भाषा शैली का भी इन पदो की भाषा शैली से कोई साम्य नही बैठता। इतना ही नही, पदाभिक्तियो मे भी पूर्णतया पूर्वापर सबंध का निर्वाह नही हुआ है। ३२ नमो नमो तुलसी महारानी, नमो नमो हरि की पटरानी। जाके दरस परस अघ नासै, महिमा वेद पुरान बखानी।