मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 306, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५३ (iv) मीरॉ के प्रभु गिरिधर नागर, चेली भई बिन मोले। (iii) कृष्ण रूप छकी है ग्वालिन, और ही और बोले। ।।४३७।। उपर्युक्त पद मे तीसरी पंक्ति मे ही टेक आ जाता है। चतुर्थ पंक्ति को यदि तृतीय पंक्ति के स्थान पर रख कर तृतीय पंक्ति को ही, अन्तिम पंक्ति बना दिया जाना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। ऐसा करने पर द्वितीय और अन्तिम पंक्ति की भाव-धारा मे व्यवधान भी नही पड़ेगा और मीराँ के पदो की परम्परा का भी निर्वाह हो जावेगा। तृतीय पंक्ति के द्वितीयांश के प्रारम्भ मे 'चेली' शब्द के बदले 'चेरी' शब्द का होना अधिक संगत प्रतीत होता है। २८ या ब्रज मे कछु देख्यो री टोना। ले मकुटी सिर चली गुजरिया, आगे मिले बाबा नन्दजी के छोना। दधि को नाम बिसर गयो प्यारी, ले लेहुरी कोई स्याम सलोना। वृन्दावन की कुज गलिन मे, आँख लगाई गयो मन मोहना। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सुन्दर स्याम सुघर सलोना। ।।४३८।। उपर्युक्त तीनो पद विशेष विचारणीय है। इन तीनो की भाषा साहित्यिक है, भाव मे भी साहित्यिक उपमाएँ व चमत्कार है। इन पदो पर ब्रजभाषा मे प्राप्त वैष्णव साहित्य का गहरा प्रभाव बहुत ही स्पष्ट हो उठता है। २९ शिव मठ पर सोहैं लाल ध्वजा। कौन कै सोहै हरी पीरी चुनरियाँ, कौन के सोहै भसम गोला। गौरी कै सोहै हरी पीरी चुनरियाँ, शिव के सोहै भसम गोला। कौन शिखर पर गौरी विराजै, कौन शिखर पर बम भोला। उत्तर शिखर पर गौरी विराजे, दक्षिण शिखर पर बम भोला। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, प्रभु के चरन पर चित मोरा।।।४३९।।†