मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह दोऊ कुल छोड़ चली वृन्दावन, हरि को टेर गई रे । छापा तिलक माल गल तुलसी, कुल की लाज गई रे । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, गोविन्द सरण लई रे ।† उपर्युक्त तीनो पाठो मे गेय परम्परा के कारण पडा हलका हेर- फेर स्पष्ट हो उठता है । सभी पाठो मे मीराँ के प्रति किसी अन्य की ही उक्ति स्पष्ट हो उठती है । साथ ही एक और अभिव्यक्ति भी विचार- णीय है । वैराग ण मीराँ की वेशभूषा मे नाथ और वैष्णव, दोनो ही परम्परा का समन्वय है, जैसा कि किसी भी अन्य पद मे नही है । शुद्ध राजस्थानी मे प्राप्त ऐसे पदो मे भी एक पद (स० ६) ऐसा मिलता है जिसमे मीराँ के आराध्य जोगी की वेश भूषा वैष्णव-परम्परानुसार ही है । उक्त पद के द्वितीय पाठ पर ब्रजभाषा का अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव भी है । उपर्युक्त दोनो ही पद विशेष विचारणीय है । २ ऐसी लगन लगाय कहाँ तू जासी । तुम देख्या बिन कल न पडत है, तलफ तलफ जिय जासी । तेरे खातर जोगण हूँगी, करवत लूँगी कासी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कवल की दासी ।।५४६।। पद की भाषा पर आधुनिक प्रभाव स्पष्ट है । ३ माईं १ म्हांनै रमइयो है दे गयो भेष१ । हम जाने हरि परम सनेही, पूरब जनम को लेष । अग बिभूत गले मृगछाला, घर घर जपत अलेय । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, रामजी मिलन की टेक ।।५४७।।† इस पद पर भी वैष्णव और नाथ दोनो ही परम्पराओ का प्रभाव स्पष्ट है । "घर घर अलख जगाय" जैसी अभिव्यक्ति नाथ-प्रभाव द्योतक अधिकांश पदो मे प्राप्त है, परन्तु "घर घर जपत अलेष" जैसी अभिव्यक्ति इस पद की विशेषता है । द्वितीय पक्ति मे प्रयुक्त "लेष" के स्थान पर "पेष" का भी प्रयोग मिलता है । १ वेश ।