मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंतमत-प्रभाव द्योतक पद ३१३ १२ जागो म्हाँरा, जगपति राइक, हँसि बोलो क्यूँ नहि। हरि छो जी हिरदा माहि, पट खोलो क्यूँ नहि। तन मन सुरति संजोडं, सीस चरणाँ धरूँ। जहाँ जहाँ देखूं म्हाँरो राम, जहाँ सेवा करूँ। सदकै करूँ जी सरीर, जुग जुग वारणै। छोड़ि छोड़ि कुल की लाज, साहिब तेरे कारणै। थोडि थोडि करूँ सिलाम, बहोत करि जाण ज्यौ। बन्दि हूँ खानाजाद, महीर, करि मान ज्यौ॥५६७॥† उपर्युक्त पद मीराँ के पदो के अन्तर्गत् ही प्राप्त है, यद्यपि पदाभिव्यक्ति से ऐसा कही से आभासित नही होता है। १३ साँवरियों म्हानै भाँग पिलाई, मेरी अँखिया मे लाली छाई। काहे री कूँडी (राधे) काहे रा घोटा, काहे री सुवाफी बणाई। तन कर कूँडी प्यारे मन कर घोटा, सुरती री सुवाफी बणाई। कदम नीचे छाँण पिवाई। पाँचो गुवाल मिल घोटन बैठे श्री गगा भर ल्याई जलझारी। प्रेम करि (राधेजी को) अधक चखाई। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, प्रेम की रीत निभाई। चरण माँहि मनड़ो लगाई ॥५६८॥† प्रभुजी मन माने तब तार। नदिया गहरी नाव पुरानी, अब कैसे उतरूँ पार। वेद पुराना सब कुछ देखे, अन्त न लागे पार। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, नाम निरन्तर सार ॥५६९॥†