भारतकोश
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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३१२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह प्रेम प्रतीति जाय निसी बासर, बहुरि न भो¹ जल आस्याँ । लोक वेद की काण न मानूँ, राम तणै रग राँचौँ । नाँव अमोलिक² इमरित रूपी, सिर कै साटै लास्याँ । उमड़ भायो म्हॉरे ऊपर, 'विषूरो प्यालो धरयाँ । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, पीवत मन डुलास्याँ ॥५६४॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। सत और वैष्णव दोनो ही मतो का प्रभाव समान रूपेण लक्षित हो उठता है । १० सतगुरु म्हॉरी प्रीत निभाज्यो जी । थे छो म्हॉरों गुण रा सागर, जोगण म्हॉरो मति जाज्यो जी । लोक न धीजै³, म्हॉरो मर्न न पतीजै⁴, मुखडारा सबद सुणाज्यो जी । म्हे तो दासी जनम जनम की, म्हॉरे ऑगणि रमता आज्यो जी । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बेडा पार लगाज्यो जी ॥५६५॥† ११ पीया की खुमार, मै तो बावरी भई ये माय । अमल न खायो आयो मोकूँ, यो इचरज देखो भार । यातन की मै बीण बजाऊँ, रीग रीग⁵ बाँधू तार । समझ बूझ मिल जायें दुलारो, जद रीझै रिझवाल ॥५६६॥† उपर्युक्त पद के विषय मे श्री सूर्यकरण जी चतुवे दी लिखते है, “मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर” जैसी छाप न होने पर भी यह पद भाव और भाषा की दृष्टि से मीराँ जी का है ।” मेरे विचार से ऐसे पदो को प्रक्षिप्त मानना ही युक्तियुक्त है। १ भव, २. अमूल्य, ३ विश्वास करै, ४ मन नही भरता, विश्वास नही होता, ५ रग रग।