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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

DevanagariRajasthanipublished365 पृष्ठ

३१२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह प्रेम प्रतीति जाय निसी बासर, बहुरि न भो¹ जल आस्याँ । लोक वेद की काण न मानूँ, राम तणै रग राँचौँ । नाँव अमोलिक² इमरित रूपी, सिर कै साटै लास्याँ । उमड़ भायो म्हॉरे ऊपर, 'विषूरो प्यालो धरयाँ । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, पीवत मन डुलास्याँ ॥५६४॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है। सत और वैष्णव दोनो ही मतो का प्रभाव समान रूपेण लक्षित हो उठता है । १० सतगुरु म्हॉरी प्रीत निभाज्यो जी । थे छो म्हॉरों गुण रा सागर, जोगण म्हॉरो मति जाज्यो जी । लोक न धीजै³, म्हॉरो मर्न न पतीजै⁴, मुखडारा सबद सुणाज्यो जी । म्हे तो दासी जनम जनम की, म्हॉरे ऑगणि रमता आज्यो जी । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, बेडा पार लगाज्यो जी ॥५६५॥† ११ पीया की खुमार, मै तो बावरी भई ये माय । अमल न खायो आयो मोकूँ, यो इचरज देखो भार । यातन की मै बीण बजाऊँ, रीग रीग⁵ बाँधू तार । समझ बूझ मिल जायें दुलारो, जद रीझै रिझवाल ॥५६६॥† उपर्युक्त पद के विषय मे श्री सूर्यकरण जी चतुवे दी लिखते है, “मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर” जैसी छाप न होने पर भी यह पद भाव और भाषा की दृष्टि से मीराँ जी का है ।” मेरे विचार से ऐसे पदो को प्रक्षिप्त मानना ही युक्तियुक्त है। १ भव, २. अमूल्य, ३ विश्वास करै, ४ मन नही भरता, विश्वास नही होता, ५ रग रग।

संतमत-प्रभाव द्योतक पद ३१३ १२ जागो म्हाँरा, जगपति राइक, हँसि बोलो क्यूँ नहि। हरि छो जी हिरदा माहि, पट खोलो क्यूँ नहि। तन मन सुरति संजोडं, सीस चरणाँ धरूँ। जहाँ जहाँ देखूं म्हाँरो राम, जहाँ सेवा करूँ। सदकै करूँ जी सरीर, जुग जुग वारणै। छोड़ि छोड़ि कुल की लाज, साहिब तेरे कारणै। थोडि थोडि करूँ सिलाम, बहोत करि जाण ज्यौ। बन्दि हूँ खानाजाद, महीर, करि मान ज्यौ॥५६७॥† उपर्युक्त पद मीराँ के पदो के अन्तर्गत् ही प्राप्त है, यद्यपि पदाभिव्यक्ति से ऐसा कही से आभासित नही होता है। १३ साँवरियों म्हानै भाँग पिलाई, मेरी अँखिया मे लाली छाई। काहे री कूँडी (राधे) काहे रा घोटा, काहे री सुवाफी बणाई। तन कर कूँडी प्यारे मन कर घोटा, सुरती री सुवाफी बणाई। कदम नीचे छाँण पिवाई। पाँचो गुवाल मिल घोटन बैठे श्री गगा भर ल्याई जलझारी। प्रेम करि (राधेजी को) अधक चखाई। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, प्रेम की रीत निभाई। चरण माँहि मनड़ो लगाई ॥५६८॥† प्रभुजी मन माने तब तार। नदिया गहरी नाव पुरानी, अब कैसे उतरूँ पार। वेद पुराना सब कुछ देखे, अन्त न लागे पार। मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, नाम निरन्तर सार ॥५६९॥†

३१४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह १४ करना फकीरी तो क्या दिलगीरी, सदा मगन मन रहना रे। कोई दिन बाड़ी तो कोई दिन बगला कोई दिन जंगल रहना रे। कोई दिन हाथी कोई दिन घोडा, कोई दिन पाँखो से चलना रे। कोई दिन गाह्दी कोई दिन तकिया, कोई दिन भोय मे पड़ना रे। कोई दिन खाना तो कोई दिन पीना, कोई दिन भूख ही मरना रे। कोई दिन पहनों तो कोई दिन ओढा, कोई दिन चिथरा पैरना रे। मीराँ कहै प्रभु गिरधर नागर, ऐसा कता करना रे ॥५७०॥† मिश्रित भाषाओं में प्राप्त पद १ कित गयो पंछी बोल तो । कची रे मटीदा महल चुनाया, गोरवाँ ही गोरवाँ१ डोल तो । गुरु गोविन्द को कह्यो न मान्यो, ऐडो ही ऐडो डोल तो । ऐठी रेठढी पाग झुका तो, छाया निरख तो चाल तो । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, हरि चरणा चित ल्यावतो । ॥५७१॥† पदाभिव्यक्ति सर्वथा असंगत ही है। २ बाल्हा, मै वैरागिण हूँगी हो । जो जो भेख म्हाँरो साहिब रीझै, सोइ सोइ धरूँगी हो । सील संतोष धरूँ घट भीतर, समता पकड रहूँगी हो । जाको नाम निरंजन कहि, ताको ध्यान धरूँगी हो । प्रेम प्रीत सूं हरि गुण गाऊँ, चरणन लिपट रहूँगी हो । १ बारी।

संतमत-प्रभाव द्योतक पद ३१५ या तन की. मै करूँ कीगरी, रसना नाम रटूंगी हो । मीराँ कहै प्रभु गिरधर नागर, साधाँ सग रहूँगी हो ।।५७२।।† पद के सभी क्रियापदो पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। प्रत्येक पंक्ति के अन्त मे 'हो' का प्रयोग अवधी प्रभाव को भी इगित करता है। ३ हेली, सुरत सोहागिन नार, मूरत मोरी राम से लगी । लगनी लहंगा पहिर सुहागिन, बीती जाय बहार। धन जोबन दिन चार का रे, जात न लागे बार। झूठे बर को क्या बरूँ जी, अधबीच मे तज जाय। बर बरलाँ राम जी, म्हाँरो चूडो अमर हो जाय। राम नाम का चुडला हो, निरगुन सुरमो सार। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणा की मै दासी। चालाँ वाही देस प्रीतम पाँवाँ, चालाँ वाही देस। कहो तो कुसुम्बी झारी संगावा, कहो तो भगवाँ भेख। कहो तो मोतियन माँग भरावॉ, कहो तो छिटकावाँ केस। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सुनियो बिड़द नरेस ॥५७३॥† उपर्युक्त पद स्पष्ट रूप से दो भागो मे विभक्त किया जा सकता है। "हेली सुरत सुहागन नार · हरि चरणा की मै दासी" पहला और "चालाँ वाही देस · सुनियो बिडद नरेस" दूसरा। यह दूसरा अश स्वतत्र पद के रूप मे भी प्रचलित है। दोनो अर्द्धांशो मे कोई भाव साम्य नही है। इस दूसरे अश की भाषा भी ठेठ राजस्थानी है, जब कि प्रथमांश की भाषा पर ब्रज और खडी बोलियो का भी प्रभाव स्पष्ट हो उठता है।

३१६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह पाठान्तर १, पिर धीवी माया जल मे पड़ी। तू तो समझि सुहागण सुस्ता नृारि, पलक कमरे रामसू लगी लगनी लँहगो पहरि सुहागण, बीतौ जाई बिन्हार । धन जोवन दिन च्यार का जातन लागे बार । राम नाम को चुडलो पहरौ, सुमरण काजल सार । माला ल्यौ हरिनाम की उतारि चलौ पैली पार । ऐसा बरकौ कांई बसूजी, जनमत ही मर जाय । बर बरस्यौ म्हाँरो साँवरोजी अमर चूड़ा होइ जाय । जनमै मरै करै घर केता, बिखराता नर नारि । मीराँ रत्ती राम सूंजी, सावरियो भरतार ॥† पाठान्तर मे पूर्व पाठ का द्वितीयाश नही है। इससे मेरे उपर्युक्त कथन का समर्थन होता है। ४ मनखा जनम पदारथ पायो, ऐसी बहुरन आता । अब के मोसर १ ज्ञान बिचारो राम राम मुख गीता । सतगुरु मिलिया सुँज पिछानी, ऐसा ब्रह्म मै पाती । सगुरा सूरा अमृत पीवै, निगुरा प्यासा जाती । मगन भयो मेरो मन सुख मे, गोविन्द का गुण गाती । साहिब पाया आदि अनादि, नातर भव मै जाती । मीराँ कहै इक आस आप की, और सूं सकुचाती ॥५७४॥† पद की भाषा पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है । विचार- णीय बात है कि उपर्युक्त तीनो ही पदो की भाषा खडी बोली और ब्रज- भाषा दोनो ही से प्रभावित है । साथ ही तीनो की अभिव्यक्ति निर्वेद- द्योतक ही है। राजस्थानी मे प्राप्त कुछ पदो से भी निर्वेद की भावना झलकती है, तथाँपि अधिकांश पदाभिव्यक्तियाँ वियोगात्मक ही हैं। १ अवसर ।

संतमत-प्रभाव द्योतक पद ३१७ ५ मै तो हरि चरणन की दासी, अब मै काहे को जाऊँ कासी । घट ही मे गगा, घट ही मे जमुना, घट घट है अविनासी । घट ही मे पुसकर औलेधेश्वर, लछिमन कबर बिलासी । जगेनाथ गगासागर है, साखी गुपाल ब्रजवासी । सेतु बध रामेश्वर ईश्वर मूलबटी सुर जासी । अवधपुरी मधुपुरी द्वारिका; चित्रकूट यमुना सी । गोवरधन गोकुल वृन्दावन, बीच मडल चौरासी । हरिद्वार कुरुखेत जनकपुर, गोदावरी हुलासी । तीरथ बडे प्रयाग गया जी, कासी तरुवर बासी । गिरिनार विन्ध्याचल सगिनार रंग है, सुघर कपिल दुखनासी । बदरी नाथ केदार गगोतरी, बैजनाथ कैलासी । पचबटी पपापुर रुक्मिणी, देव कपिल युवरासी । नैमषार श्रगीरिष मिसरिष, कासी पाप बिनासी । मुटुकनाथ अस मानसरोवर, भानलता अरु हाँसी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सहज कटै यम फाँसी ॥५७५॥† पदाभिव्यक्ति सर्वथा अर्थहीन है। भाषा की दष्टि से भी यह विचारणीय है। प्रथम और अन्तिम पक्ति मे प्रयुक्त क्रियापदो के आधार पर भाषा खडी बोली स प्रभावित कही जा सकती है। शष सम्पूर्ण पद की भाषा को बोलचाल की भाषा कहा जा सकता है। ऐसे अर्थहीन पदो को प्रामाणिक सग्रह मे स्थान नही मिलना ही उपयुक्त होगा ।