मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमतभेद २५ पाठान्तर २, अब ना रहूगी स्याम अटकी, अजी म्हारो गिरधर से लाग्यौ माणक मोती परत न पहिनूँ, मै तो नट गई कब की । गहणो म्हारे माला कठी, और चन्दन की कुटकी । राजापणा 'की रीति गुमाई, साधन के संग भटकी । जेठ भऊ की लाज न राखी , घूँघट परै जो पटकी । राज रीति मे करम लिखायो, हरि सागर मे लटकी । चोट लगी निज नाम हरि की, सो म्हारे हिवडे खटकी । प्रेम गुरा के चरण गहू, परणाम करू सिर लटकी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जनम मरण सूं छुटकी । उपर्युक्त दोनो पाठो मे “जेठ भऊ की लाज न राखी” अभिव्यक्ति विशेष महत्व पूर्ण है । प्रथम पाठ मे “राणा” को सम्बोधित किया गया है । यद्यपि अन्य पाठो से यह नही मालूम पडता कि पद किसी विशेष व्यक्ति को सम्बोधित करके कहा गया है। क्या यह “राणा” मीराँ के जेठ है ? जैसा कि उपर्युक्त दोनो पाठान्तरो से प्रतीत होता है। तब मीराँ किस की स्त्री थी ? अद्यावधि मान्य इतिहासानुसार मीराँ के पति भोजराज ही पाटवी के कुमार थे । पाठान्तर ३, अब न रहूगी अटकी, म्हारो मन लाग्यो गिरधर से । म्हाने गुरु मिलिया अविनासी , दई ज्ञान की गुटकी । लगी चोट निज नाम धणी की, म्हारे हिवड़े खटकी । माणक मोती मे न पहिनूँ, मै तो कब न नटकी । गहना म्हारे दोवड़ो, और चनणां की कुटकी । राजकुल की लाज गमाई, साधा के सग भटकी । नित प्रति उठि जाऊ गुरू दरसन, नाचूँ दै दै चुटकी । परम गुरा के सरणे जाऊ, करू प्रणाम सिर लटकी । जेठ बहू की काण न माना, पडो घूँघट पर पटकी ।