मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमतभेद २७ पाठान्तर ६, माई ! मै तो गोविन्द सो अटकी । चकित भए मै दृग दोऊ मेरे, लखि शोभा नटकी । शोभा अग अग प्रति भूषण, बनमाला लटकी । मोर मुकुट कटि किकनि राजे, दुति दामिनी पटकी । रमित भई हो सावरे के सग, लोग कहै भटकी । छुटि लाज कानि लोग, डर रह्यो न घर हटकी । बिना गोपाल लाल बिन सजनी, को जाने घटकी । मीराँ प्रभु के सग फिरेगी, कुज कुज भटकी ।† पाठान्तर ५ और ६ की भाषा स्पष्ट रूपेण ब्रज भाषा है। भाषा के इस अतर के साथ ही साथ भावाभिव्यक्ति मे भी कितना गहरा अन्तर आ गया है। यह पहलू अत्यन्त विचारणीय ह। खडी बोली से प्रभावित राजस्थानी भाषा मे प्राप्त सम्पूर्ण पाठो से सतमत का प्रभाव स्पष्ट हो उठता है, जब कि ब्रजभाषा के पदो से वैष्णव प्रभाव ही स्पष्ट होता है। ब्रजभाषा में प्राप्त पद १ बरजी मै काहू की नाहि रहू । सुनो री सखी तुम सो, या मन की साची बात कहू । साधु सगति करि हरि सुख लेऊ, जगतै हौ दूरि रहू । तन मन धन मेरो सब ही जावो, भल मेरो सीस लहू । मन मम लाग्यो सुमरन सेती, सब का मै बोल सहू । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सद्गुरू शरण गहू । ॥२४॥ उपर्युक्त पाठ की प्रथम पक्ति मे निम्नांकित पाठान्तर पाए जाता है — सुनो री सखी तुम चेतंन होइ के, मन की बात कहू ।