मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 96, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ेंवियोगाभिव्यक्ति ३७ काढि करेजो मै धरू, कागा तू ले जाइ। जा देसा म्हारो पिव बसै, वे देखे तू खाइ। छनि आगनि छनि मदिरा, छनि छनि ठाढी होइ। छाइ ज्यूँ घूमत फिरू, म्हारो मरम न जाने कोइ। तन सूखि पिंजर भयौ, सूका ब्रच्छ की छांहा। आगलियारी मूँदडी म्हारे आवण लागी बाँहा। रे रे पापी पषीवडा, पीव का नाम न लेह। पिव मिलै तो मै जीवूँ, नातरि त्यागूँ (म्हारो) जीव। कोइक हरजन सामलै¹ रे, पिव कारण जिव देह। मीराँ व्याकुल ब्रहनी, पिव बिन कसौ सनेह। ॥३८॥ पाठान्तर १, नातो नाम को रे मोसूँ तनक न तोड्यो जाय। पाना ज्यूँ पीली पडी रे, लोग कहै घट रोग। छाने लाघण मै किया रे, राम मिलण के जोग। बाबल बैद बुलाइया रे, पकड दिखाई म्हाकी बाह। मूरखि बैद मरम नही जाणै, करक कलेजा माह। जा बैदा घरि आपणै रे, मेरो नाव न लेइ। मै तो दाधी विरह की रे, तू काहे को दारु² देइ। मास गले गल³ छीजिया⁴ रे, करक रह्या⁵ गल आहिँ। आगलिया रो मूँडडो रे, म्हारे, आवण लाग्यो बाहि। रहो रहो पापी पपीहरा रे, पिव को नाम न लेइ। जे कोई विरहणी साम्हले, (सजनी) पिव कारण जिव देइ। खिण मदिर खिण आगणे, खिन खिन ठाढी होइ। घायल ज्यूँ घूमूँ सदा री, म्हारी बिथा न बूझै कोइ। १ साम्हैलै, सुनले, २ दवा, ३ गल-गल कर, ४ क्रमश नष्ट हो गया, ५ आकर, गले मे आकर। *