मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
संतमत-प्रभाव द्योतक पद ३१५ या तन की. मै करूँ कीगरी, रसना नाम रटूंगी हो । मीराँ कहै प्रभु गिरधर नागर, साधाँ सग रहूँगी हो ।।५७२।।† पद के सभी क्रियापदो पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है। प्रत्येक पंक्ति के अन्त मे 'हो' का प्रयोग अवधी प्रभाव को भी इगित करता है। ३ हेली, सुरत सोहागिन नार, मूरत मोरी राम से लगी । लगनी लहंगा पहिर सुहागिन, बीती जाय बहार। धन जोबन दिन चार का रे, जात न लागे बार। झूठे बर को क्या बरूँ जी, अधबीच मे तज जाय। बर बरलाँ राम जी, म्हाँरो चूडो अमर हो जाय। राम नाम का चुडला हो, निरगुन सुरमो सार। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणा की मै दासी। चालाँ वाही देस प्रीतम पाँवाँ, चालाँ वाही देस। कहो तो कुसुम्बी झारी संगावा, कहो तो भगवाँ भेख। कहो तो मोतियन माँग भरावॉ, कहो तो छिटकावाँ केस। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सुनियो बिड़द नरेस ॥५७३॥† उपर्युक्त पद स्पष्ट रूप से दो भागो मे विभक्त किया जा सकता है। "हेली सुरत सुहागन नार · हरि चरणा की मै दासी" पहला और "चालाँ वाही देस · सुनियो बिडद नरेस" दूसरा। यह दूसरा अश स्वतत्र पद के रूप मे भी प्रचलित है। दोनो अर्द्धांशो मे कोई भाव साम्य नही है। इस दूसरे अश की भाषा भी ठेठ राजस्थानी है, जब कि प्रथमांश की भाषा पर ब्रज और खडी बोलियो का भी प्रभाव स्पष्ट हो उठता है।
३१६ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह पाठान्तर १, पिर धीवी माया जल मे पड़ी। तू तो समझि सुहागण सुस्ता नृारि, पलक कमरे रामसू लगी लगनी लँहगो पहरि सुहागण, बीतौ जाई बिन्हार । धन जोवन दिन च्यार का जातन लागे बार । राम नाम को चुडलो पहरौ, सुमरण काजल सार । माला ल्यौ हरिनाम की उतारि चलौ पैली पार । ऐसा बरकौ कांई बसूजी, जनमत ही मर जाय । बर बरस्यौ म्हाँरो साँवरोजी अमर चूड़ा होइ जाय । जनमै मरै करै घर केता, बिखराता नर नारि । मीराँ रत्ती राम सूंजी, सावरियो भरतार ॥† पाठान्तर मे पूर्व पाठ का द्वितीयाश नही है। इससे मेरे उपर्युक्त कथन का समर्थन होता है। ४ मनखा जनम पदारथ पायो, ऐसी बहुरन आता । अब के मोसर १ ज्ञान बिचारो राम राम मुख गीता । सतगुरु मिलिया सुँज पिछानी, ऐसा ब्रह्म मै पाती । सगुरा सूरा अमृत पीवै, निगुरा प्यासा जाती । मगन भयो मेरो मन सुख मे, गोविन्द का गुण गाती । साहिब पाया आदि अनादि, नातर भव मै जाती । मीराँ कहै इक आस आप की, और सूं सकुचाती ॥५७४॥† पद की भाषा पर खडी बोली का प्रभाव स्पष्ट है । विचार- णीय बात है कि उपर्युक्त तीनो ही पदो की भाषा खडी बोली और ब्रज- भाषा दोनो ही से प्रभावित है । साथ ही तीनो की अभिव्यक्ति निर्वेद- द्योतक ही है। राजस्थानी मे प्राप्त कुछ पदो से भी निर्वेद की भावना झलकती है, तथाँपि अधिकांश पदाभिव्यक्तियाँ वियोगात्मक ही हैं। १ अवसर ।
संतमत-प्रभाव द्योतक पद ३१७ ५ मै तो हरि चरणन की दासी, अब मै काहे को जाऊँ कासी । घट ही मे गगा, घट ही मे जमुना, घट घट है अविनासी । घट ही मे पुसकर औलेधेश्वर, लछिमन कबर बिलासी । जगेनाथ गगासागर है, साखी गुपाल ब्रजवासी । सेतु बध रामेश्वर ईश्वर मूलबटी सुर जासी । अवधपुरी मधुपुरी द्वारिका; चित्रकूट यमुना सी । गोवरधन गोकुल वृन्दावन, बीच मडल चौरासी । हरिद्वार कुरुखेत जनकपुर, गोदावरी हुलासी । तीरथ बडे प्रयाग गया जी, कासी तरुवर बासी । गिरिनार विन्ध्याचल सगिनार रंग है, सुघर कपिल दुखनासी । बदरी नाथ केदार गगोतरी, बैजनाथ कैलासी । पचबटी पपापुर रुक्मिणी, देव कपिल युवरासी । नैमषार श्रगीरिष मिसरिष, कासी पाप बिनासी । मुटुकनाथ अस मानसरोवर, भानलता अरु हाँसी । मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, सहज कटै यम फाँसी ॥५७५॥† पदाभिव्यक्ति सर्वथा अर्थहीन है। भाषा की दष्टि से भी यह विचारणीय है। प्रथम और अन्तिम पक्ति मे प्रयुक्त क्रियापदो के आधार पर भाषा खडी बोली स प्रभावित कही जा सकती है। शष सम्पूर्ण पद की भाषा को बोलचाल की भाषा कहा जा सकता है। ऐसे अर्थहीन पदो को प्रामाणिक सग्रह मे स्थान नही मिलना ही उपयुक्त होगा ।