भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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६६ | मेघदूतम्

यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि "णिच्" प्रत्यय स्वार्थ में है "प्रेरणा" में नहीं ताकि अर्थभेद को आपत्ति आ सके। कवि को इस दोष से बचाने के लिए मल्लिनाथजी "विश्रामो वा" इस सूत्र को प्रस्तुत करते हैं, उनका कहना है कि यह सूत्र चान्द्र व्याकरण का है। कुछ लोगों का कहना है कि यह सूत्र जैनेन्द्र व्याकरण का है। जो कुछ भी हो, किसी भी व्याकरण से सिद्ध तो है ही, परन्तु पाणिनि नहीं सिद्ध कर सके। महोपाध्याय मल्लिनाथजी ऊपर णिजन्तादि प्रक्रिया की अपेक्षा "श्रमणं श्रमः, भावे घञ्" और श्रम शब्द से स्वार्थेऽण् करके "श्राम" शब्द सिद्ध करके पुनः विगतः श्रामो यस्मिन् इति "विश्रामः" यह प्रक्रिया भी सरल और लघु होते हुए दोष विघातक भी है। पुलकितम्-"पुलकाः सञ्जाता यस्य" इस विग्रह में "तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच्" इस सूत्र से "इतच्" प्रत्यय करके "पुलकित" यह रूप बना है। उक्त रूप इसी शब्द के द्वितीया के एक वचन का है। पण्यस्त्री०—यहाँ "पण्य शब्द" "पणितुं योग्या" इस विग्रह में निन्दा अर्थ में "अवद्यपण्यवर्या गर्ह्यपणितव्याऽनिरोधेषु" इस सूत्र से निपातन किया गया है। उद्गारिभिः—यहाँ उद्गार शब्द का प्रयोग गौणवृत्या होने के कारण जुगुप्साव्यञ्जक अश्लीलता नहीं आ पायी है। क्योंकि दण्डी की "निष्ठ्यूतोद्गोर्ण०" वाली पंक्ति इसका प्रमाण है॥ २५ ॥

विश्रान्तः सन् व्रज वननदीतीरजातानिसिञ्च-
न्नुद्यानानां नवजलकणैर्यू थिका—जालकानि।
गण्डस्वेदापनयनरुजाक्लान्तकर्णोत्पलानाम्
छायादानात् क्षणपरिचितः पुष्पलावीमुखानाम् ॥ २६ ॥

अन्वयः—तत्र विश्रान्तः सन् वननदीतीर-जातानि उद्यानानाम् यूथिका-जालकानि नवजलकणैः सिञ्चन् गण्डस्वेदापनयनरुजाक्लान्तकर्णोत्पलानाम् पुष्पलावीमुखानाम् छायादानात् क्षणपरिचितः ( सन् ) ।

व्याख्या—तत्र = विदिशायां स्थिते नीचैः गिरौ, विश्रान्तः सन् = गतश्रमः सन्, वननदीतीरजातानि = वन्यसरित्कूलोद्भवभावि, उद्यानानाम् = आरामाणाम्,