भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पूर्वमेघः ६७

यूथिकाजालकानि=मागधीपुष्प-कुड्मलानि, नवजलकणैः=नूतन-सलिलबिन्दुभिः, सिञ्चन्=आर्द्रयन्; गण्डस्वेदापनयन-रुजाक्लान्तकर्णोत्पलानाम्=कपोलस्वेदा-पनयनपीडाक्षामश्रोत्रपद्मानाम्; पुष्पलावीमुखानाम् = पुष्पावचायिकावदनानाम्; छायादानात्=अनातपीकरणात्, क्षणपरिचितः = किञ्चित्कालेन ज्ञातः, (सन्) व्रज = गच्छ ।

शब्दार्थः—तत्र=उस “नीचैः” नामक पर्वत पर; विश्रान्तः सन्=विश्राम करके, वननदीतीरजातानि=जंगली नदियों के किनारे उत्पन्न, उद्यानानाम्=बगीचों के, यूथिकाजालकानि=माधवी की कलियों को, नवजलकणैः=नूतन-जलबूंदों से, सिञ्चन्=सींचता हुआ, गण्डस्वेदापनयनरुजाक्लान्तकर्णोत्पलानाम् = जिसके कानों में ( पहने गये ) कमल गालों पर ( चूते हुए ) पसीने को पोछने के कारण मुरझा गये हैं, ऐसे, पुष्पलावीमुखानाम् = फूल तोड़नेवाली महिलाओं के मुखों का, छायादानात् = छाया देने के कारण, क्षणपरिचितः=कुछ समय के लिए परिचित होकर, व्रज=जाना ।

भावार्थः—( हे मेघ ! ) नीचैरद्रौ विश्रम्य नदीतटोत्पन्नानि आरामाणां मागधीकुसुमकुड्मलानि नूतनजललवैराद्रींकुर्वन् पुष्पावचयनपरायणानां नारीमुखानां गण्डघर्मजलदूरीकरणेन म्लानकर्णाऽऽभरणीभूतपद्मानां छायाप्रदानेन किञ्चित्कालाय परिचितः सन् गच्छ ।

हिन्दी—( हे मेघ ! ) वहां नीचैः नामक पर्वत पर विश्राम करके जंगली नदियों के तट पर विद्यमान बगीचों के जूही पुष्प की कलियों को नवीन जलकणों से सींचता हुआ, जिनके कानों में पहिने गये कमल गालों पर बहते हुए पसीनों को पोछने के कारण मुरझा गये हैं, ऐसी फूल तोड़ने वाली महिलाओं के मुख को छाया प्रदान करने के कारण कुछ समय के लिए परिचित होकर (आगे) जाना ।

समासः—वने या नद्यः तासां तीरेषु जातानि=वननदीतीरजातानि (बहुव्री०)। नवजलानां कणास्तैः (ष०तत्०) नवजलकणैः । गण्डयोःस्वेदः=गण्ड-स्वेदः (स० तत्०) गण्डस्वेदस्य अपनयनम गण्डस्वेदापनयनम् (ष० तत्०), तेन रुजा (तृ० तत्०) तया क्लान्तानि (तृ० तत्०) गण्डस्वेदापनयनरुजाक्लान्तानि,