मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ७५
टिप्पणी-वेणीभूतप्रतनुसलिला—अवेणी वेणी यथा सम्पद्यते तथाभूतं वेणीभूतम्; यहाँ अभूत तद्भाव अर्थ में "वेणी" शब्द से "कृभ्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्विः" प्रत्यय होकर एवं "भू" धातु से "क्त" प्रत्यय लाकर "वेणीभूत" ऐसा रूप सम्पन्न होता है (वेणी + च्वि + भू + क्त) । रुहाः—रोहन्तीति रुहाः, "रुह" धातु से "इगुपधज्ञाप्रीकिर कः" इस सूत्र से "क" प्रत्यय होकर बहुवचन की विवक्षा में "रुहाः" ऐसा रूप बना है। सिन्धुः—कुछ टीकाकार "सिन्धु" को स्वतन्त्र मालवदेश में बहनेवाली "काला सिन्धु" नदी ही मानते हैं। परन्तु महोपाध्याय मल्लिनाथजी "सिन्धु" का अर्थ सामान्यतया निर्विन्ध्या ही करते हैं। जो भी हो, हमने अपनी व्याख्या में "वा" करके दोनों का उल्लेख कर दिया है।
अलङ्कारः—इस श्लोक में लिङ्गसाम्य के द्वारा सिन्धु से नायिका का एवं मेघ से नायक का व्यवहार किया गया है, अतः यहाँ "समासोक्ति" नामक अलङ्कार है ॥ २९ ॥
प्राप्यावन्तीनुदयनकथा—कोविदग्रामवृद्धान्-
पूर्वोद्दिष्टामनुसर पुरीं श्रीविशालां विशालाम् ।
स्वल्पीभूते सुचरितफले स्वर्गिणां गां गतानां
शेषैः पुण्यैर्हृतमिव दिवः कान्तिमत् खण्डमेकम् ॥३०॥
अन्वयः—उदयनकथाकोविदग्रामवृद्धान् अवन्तीन् प्राप्य सुचरितफले स्वल्पीभूते गां गतानां स्वर्गिणां शेषैः पुण्यैः हृतं कान्तिमत् एकं दिवः खण्डम् इव पूर्वोद्दिष्टाम् श्रीविशालाम् विशालाम् पुरीम् अनुसर ।
व्याख्या—उदयनकथाकोविदग्रामवृद्धान् = वत्सराजकथाविज्ञजनपदवृद्धान्, अवन्तीन् = मालवदेशान्, प्राप्य = गत्वा, सुचरितफले = पुण्यफले, स्वल्पीभूते = क्षीणे सति, "क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति" इति भगवद्वाक्यानुसारम्, गाम् = पृथ्वीम्, गतानाम् = प्राप्तानाम्, स्वर्गिणाम् = देवलोकनिवासिनाम्, शेषैः =