मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ७९
समासः—स्फुटितानि च तानि कमलानि = स्फुटितकमलानि (कर्म-धा०) तेषाम् आमोदः (ष० तत्०) तेन मैत्री (तृ० तत्०) तया कषायः = स्फुटितकमलामोदमैत्रीकषायः (तृ० तत्०)। अदीर्घं दीर्घं करोतीति दीर्धीकरोति (अभूततद्०)। सुरतस्य ग्लानि सुरतग्लानि (ष० तत्०)। प्रार्थनायां चाटुकारः = प्रार्थनाचाटुकारः (स० तत्०)। अङ्गानाम् अनुकूलः अङ्गानुकूलः (ष० तत्०)।
कोशः—प्रत्यूषोऽहर्मुखं कल्यम्, इत्यमरः। ध्वनौ तु मधुरास्फुटे कलः, इत्यमरः। सरसो मैथुनी कामी गोनर्दः पुष्कराह्वयः, इति यादवः। चक्राङ्गः सारसो हंसः, शब्दार्णवः। मदोरेतसिकस्तूर्यां गर्वे हर्षे भेदानयोः, इति मेदिनी। पटुर्दक्षे च नीरोगे चतुरेऽप्यभिधेयवत्, इति मेदिनी। रागद्रव्ये कषायोऽस्त्री निर्यासे सौरभे रसे, इति यादवः। विमर्दोत्थे परिमलो गन्धे जनमनोहरे। आमोदः, इत्यमरः।
टिप्पणी—सरसि चरन्ति = सारसाः, या सरसि भवाः सारसाः—दोनों अर्थों में “सरस” शब्द से अण् प्रत्यय लाकर “सारस” शब्द निष्पन्न किया जाता है। मैत्री—मित्रस्य भावः—मित्र शब्द से भाव या कर्म में 'ष्यञ्' प्रत्यय करके उसके आदि वृद्धि करके षित्त्वात् “षिद्गौरादिभ्यश्च” से ङीष् करके “मैत्री” शब्द की निष्पत्ति होती है। “अङ्गानुकूल” को यदि वायु का विशेषण मानते हैं तब तो शरीर को सुख देने वाला यह अर्थ होगा, यदि “प्रियतम” का विशेषण मानें तब गाढालिङ्गन के द्वारा “नायिका के अङ्गों को सुख देने वाले” ऐसा अर्थ होगा। अच्छा तो यह होता कि “देहलीदीपकन्यायेन” दोनों का विशेषण माना जाता। शिप्रा नदी उज्जयिनी के समीप बहती है जो कि बहुत ही प्रसिद्ध नदी है। कुछ लोग यहाँ “प्रार्थना चाटुकारः” को लेकर “खण्डिता” नायिका के अनुनय की कल्पना करते हैं। परन्तु मल्लिनाथजी ने उसका खण्डन इसलिए किया है कि यहाँ खण्डिता नायिका के साथ पहले संभोग नहीं किया गया और इसलिए अनुनय कर रहा है तो पुनः उसके “सुरतग्लानि” का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है। अतः यहाँ खण्डिता नायिका नहीं है बल्कि स्वकीया है जिसके साथ एक बार संभोग कर चुकने
६ मे० दू०