भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

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पूर्वमेघः १५७

कामिनीपक्षे तु विगतः मानो यस्याः सा विमाना ( बहु० ) अतिशयेन विमाना उच्चैर्विमाना ( कुगतिप्रादयः ) । अभ्राणां वृन्दम् = अभ्रवृन्दम् ( ष० तत्० ) । मुक्तानां जालम्=मुक्ताजालम् ( ष० तत्० ) सलिलम् उद्गिरतीति सलिलोद्गारः ( उपपद० ) तम् ।

कोशः— उत्सङ्गो मुक्तसंयोगे सक्थन्यूर्ध्वतलेऽपि च, इति मालतीमालायाम् । दुकूलं सूक्ष्मवस्त्रे स्यादुत्तरीये सितांशुके, इति शब्दार्णवः । विमानोऽस्त्री देवयाने सप्तभूमौ च सद्मनि, इति यादवः । पुंश्चल्यां मौक्तिके मुक्ता, इति यादवः । अलकाश्चूर्णकुन्तला, इत्यमरः ।

टिप्पणी— कामचारिन्— "काम" उपपदपूर्वक "चर्" धातु से ताच्छील्य अर्थ में "णिनि" प्रत्यय करके कामचारिन् ऐसा रूप निष्पन्न होता है। यह सम्बोधन का रूप है। प्रणयिनः— "प्रणय" शब्द से 'अतइनिठनौ' इस सूत्र से "इनि" प्रत्यय करके "प्रणयिन" शब्द बनता है। यह रूप षष्ठी विभक्ति का है। उत्संगः— "उद्" उपसर्गपूर्वक "सञ्ज्" धातु से "हलश्च" इस सूत्र से घञ् प्रत्यय करके "उत्सङ्गः" ऐसा रूप होता है। न ज्ञास्यसे न— यहां दो नञ् का प्रयोग है जो दृढ़ता का बोधक होता है 'द्वौ नञौ प्रकृत्यर्थं गमयतः' इस वचन से । ग्रथितः— 'ग्रंथ' धातु से 'क्त' प्रत्यय करके ग्रथित ऐसा रूप बनता है। वहति— प्रापणार्थक 'वह' धातु के लट् लकार के प्रथमपुरुष के एकवचन का यह रूप है।

अलंकारः— प्रस्तुत पद्य में कैलास में प्रणयी का साम्य तथा अलका में प्रणयिनी का साम्य गम्य है अतः एकदेश-विवर्तनी 'उपमा' अलंकार है। एवञ्च दोनों निरपेक्ष भाव से हैं अतः 'संसृष्टि' अलंकार है।

एक ही नायिका में आसक्त प्रणयी नायक को 'अनुकूल' एवं प्रियतम से उपलालित नायिका को स्वाधीनपतिका कहते हैं। प्रकृत में "कैलास" अनुकूल नायक है एवं 'अलका' स्वाधीन-पतिका नायिका ध्वनित है ॥ ६३ ॥

॥ इति शिवो वः शिवं तनोतु ॥

इति पूर्वमेघः