भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 335 में से

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१५६ मेघदूतम्

सलिलोद्गारम् = जलोत्सजर्नम्, अभ्रवृन्दम् = मेघनिचयम्, कामिनी = वनिता, मुक्ताजालग्रथितम् = मौक्तिक-प्रचुरैर्गुम्फितम्, अलकमिव = केशपाशमिव, वहति = धारयति ।

शब्दार्थः—हे कामचारिन् = हे स्वच्छन्दचारी, प्रणयिन इव = प्रियतम की तरह, तस्य = उस (कैलास) की, उत्संगे = गोद में, स्रस्तगङ्गादुकूलाम् = खिसक गयी है गंगारूपी साड़ी जिसकी, ऐसी, अलकाम् = पुरी (रूपी कामिनी को) को, दृष्ट्वा = देखकर, त्वम् = तुम, पुनः = फिर, न = नहीं, ज्ञास्यसे = पहचानोगे (इति = ऐसा) नहीं, अर्थात् अवश्य पहचानोगे। उच्चैर्विमानाः = ऊँचे-ऊँचे सात-सात मंजिलों के भवन वाली, या = जो अलका, वः = तुम्हारे, काले = समय में, अर्थात् वर्षा के समय में, ललिलोद्गारम् = जल (के प्रवाह को छोड़नेवाले, अभ्रवृन्दम् = मेघ के समूह को, कामिनी = स्त्री, मुक्ताजाल-ग्रथितम् = मोतियों की लड़ियां जिसमें गुँथी हुई हैं ऐसे, अलकामिव = केश के समान, वहति-धारण करती है।

भावार्थः—हे स्वेच्छाचारिन् ! प्रणयिनः इव कैलासस्योत्सङ्गे च्युतगंगा-वस्त्राम् अलकां प्रियतमस्याङ्के अवस्रस्तक्षौमा प्रेयसीमिव विलोक्य अवश्यं परि-चेष्यसे । या समुन्नतभवना अलका वर्षामये जलवर्षके मेघसमूहं क्रोध-रहिता रमणी मुक्तासमूहानुस्यूतं केशपाशमिव धारयति ।

हिन्दी—हे स्वच्छन्द भ्रमणशील ! प्रियतम के समान कैलास की गोद में खिसक गया है गंगारूपी वस्त्र जिसका ऐसी अलका को प्रियतम की गोद में खिसक गयी है साड़ी जिसकी ऐसी कामिनी की तरह देखकर अवश्य पहचान जाओगे । जो अलका वर्षा के समय जल बरसाने वाले मेघ-समूह को वैसे ही धारण करती है जैसे क्रोध-रहित कोई कामिनी मोतियों की लड़ियों से गुंथे केश-पाश को धारण करती है ।

समासः—अलकापक्षे-गङ्गा दुकूलमिव-इति गङ्गादुकूलम् ( "उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे" ) । कामिनी पक्षे-गङ्गा इव दुकूलम् (उपमानानि सामान्यवचनैः ) स्रस्तं गङ्गादुकूलं यस्याः सा = स्रस्तगङ्गादुकूला (बहु०) ताम् । उच्चैः विमानानि यस्याः सा उच्चैर्विमाना (बहु०) इत्यलकापक्षे ।

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