मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः १८३
टिप्पणी—कामिनीनाम्— प्रशस्तः कामोऽस्यासामिति कामिन्यः तासाम्। चाणक्य ने "आहारो द्विगुणः स्त्रीणां बुद्धिस्तासां चतुर्गुणाः। षड्गुणो व्यवहारश्च कामश्चाष्टगुणः स्मृतः।" ऐसा स्त्रियों के सम्बन्ध में लिखा है। अतः स्त्री को कामिनी कहा जाता है, क्योंकि उनमें पुरुषों की अपेक्षा आठगुणा अधिक कामाऽऽवेश रहता है। यहाँ कामिनी का अर्थ सर्वसाधारण स्त्री नहीं अपितु "अभिसारिका" का ग्रहण होता है। नैशः— निशायां भवः नैशः यहाँ "निशा" शब्द से "तत्र भवः" इस सूत्र से अण् प्रत्यय और वृद्धि की गयी है। उत्कम्पः— "उत्" उपसर्गपूर्वक "कम्प" धातु से भाव में "घञ्" प्रत्यय करके "उत्कम्पः" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। पतितः— "पत्" धातु से 'क्त' प्रत्यय करके "पतित" शब्द निष्पन्न होता है। कर्णविभ्रंशिभिः— कर्णेभ्यः विभ्रंशयन्तीति तच्छीलानि इस विग्रह में कर्ण उपपदक एवं "वि" उपसर्गपूर्वक "भ्रंश्" धातु से "णिनि" प्रत्यय करके उपपद समास करके "कर्णविभ्रंशिन्" ऐसा शब्द निष्पन्न होता है। उक्त रूप तृतीया के बहुवचन का है। सूच्यते— 'सूच्' धातु से "हेतुमति च" इस सूत्र से णिच् प्रत्यय लाकर पुनः धातु संज्ञा करके लट् लकार "णिचश्च" इस सूत्र से आत्मनेपद हो जायेगा, प्रथमपुरुष के एकवचन में सूच्यते ऐसा रूप बन जायेगा।
अलङ्कारः— यहाँ रात्रिमार्ग सूचन रूपी एक कार्य के लिए अलक से गिरे हुए मन्दार-पुष्प आदि अनेक कारणों का कथन होने के कारण "समुच्चय" अलङ्कार एवं गिरे हुए मन्दार पुष्पों के द्वारा रात्रि मार्ग रूप साध्य का ज्ञान होने से "अनुमान" अलङ्कार है ॥ ९ ॥
मत्वा देवं धनपतिसखं यत्र साक्षाद्वसन्तं प्रायश्चापं न वहति भयान्मन्मथः षट्पदज्यम् । सभ्रूभङ्ग-प्रहित-नयनैः कामिलक्ष्येष्वमोघै- स्तस्यारम्भश्चतुर-वनिता-विभ्रमैरेव सिद्धः ॥१०॥
अन्वयः— यत्र, मन्मथः, धनपतिसखम्, देवम्, साक्षात्, वसन्तम्, मत्वा,