भारतकोश
मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)

Meghadutam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished335 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 335 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 241
२००मेघदूतम्

होता है। प्रकृत धातु अनुदात्तेत होने के कारण “अनुदात्तङित आत्मनेपदम्” इस सूत्र से आत्मनेपदसंज्ञक ही है। अतः शानच् ही होगा शतृ नहीं। यामध्यास्ते—यहाँ “अधि” उपसर्गपूर्वक “आस्” धातु के योग में “अधिशीङ्स्थाऽसां कर्म” इस सूत्र से आधार रूप “यत्” शब्द को कर्मसंज्ञा होकर द्वितीया विभक्ति हुई है।

अलङ्कारः—यहाँ लोकातिशय समृद्धि का वर्णन होने के कारण “उदात्त” एवं “अनतिप्रौढवंशप्रकाशैः” यहाँ “लुप्तोपमा अलङ्कार” है ।। १६ ।।

एभिः साधो ! हृदयनिहितैर्लक्षणैर्लक्षयेथा
द्वारोपान्ते लिखितवपुषौ शङ्खपद्मौ च दृष्ट्वा ।
क्षामच्छायं भवनमधुना मद्वियोगेन नूनं
सूर्यापाये न खलु कमलं पुष्यति स्वामभिख्याम् ।।१७।।

अन्वयः—हे साधो ! हृदयनिहितैः, एभिः, लक्षणैः, द्वारोपान्ते, लिखित-वपुषौ, शङ्खपद्मौ, च, दृष्ट्वा, नूनम्, अधुना, मद्वियोगेन, क्षामच्छायम्, भवनम्, लक्षयेथाः, सूर्यापाये, कमलम्, स्वाम्, अभिख्याम्, न, पुष्यति, खलु ।। १७ ।।

व्याख्या—हे साधो ! = हे भद्र !, हृदयनिहितैः = चित्तसञ्चितैः, एभिः=पूर्वोक्तैः, लक्षणैः=चिह्नैः, द्वारोपान्ते=कपाटपार्श्वयोः लिखितवपुषौ=चित्रितशरीरौ, शङ्खपद्मौ=एतन्नामकनिधिविशेषौ, च दृष्ट्वा=अवलोक्य च, नूनम्=अवश्यम्, अधुना=इदानीम्, मद्वियोगेन=मम विरहेण, क्षामच्छायम्=कृशकान्ति, भवनम्=गृहम्, लक्षयेथाः=जानीहि। सूर्यापाये=दिनकरास्ते, कमलम्=पद्मम्, स्वकीयाम्, अभिख्याम्=कान्तिम्, न पुष्यति=न धारयति ।। १७ ।।

शब्दार्थः—हे साधो=हे सज्जन !, हृदयनिहितैः=हृदय में रखे, एभिः = इन पहले कहे गये, लक्षणैः=चिह्नों से, द्वारोपान्ते=दरवाजे के दोनों ओर,

मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 241, कुल 335 में से · BharatKosha