मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरमेघः १९९
**समासः—**तयोर्मध्ये = तन्मध्ये ( ष० तत्० ) न अतिप्रौढाः=अनतिप्रौढाः (नञ्०) अनतिप्रौढाश्च ते वंशाः=अनतिप्रौढवंशाः ( कर्म० ) अनतिप्रौढ-वंशानामिव प्रकाशो येषान्ते=अनतिप्रौढवंश-प्रकाशाः ( व्यधिकरण बहु० ) तैः । स्फटिकं फलकं यस्याः सा स्फटिकफलका (बहु०) । वासस्य यष्टिः=वास-यष्टिः ( ष० तत्० ) । शिञ्जा प्रधानानि वलयानि शिञ्जावलयानि ( मध्यम-पदलोपी० ), शिञ्जावलयैः सुभगाः = शिञ्जावलयसुभगाः ( तृ० तत्० ) तैः । दिवसस्य विगमः दिवसविगमः ( ष० तत्० ) तस्मिन् ।
**कोशः—**भूषणानान्तु शिञ्जितम्, इत्यमरः । मयूरो बर्हिणो बर्ही नीलकण्ठो भुजङ्गभुक्, इत्यमरः । अथ मित्रं सखा सुहृत्, इत्यमरः ।
टिप्पणी—प्रौढाः—"प्र" उपसर्गपूर्वक "वह" धातु से "क्त" प्रत्यय करके "हो ढः" इस सूत्र से धातु के हकार को ढत्व करके "व" को सम्प्रसारण करके "सम्प्रसारणाच्च" इस सूत्र से पूर्वरूप करके प्र + ऊढ ऐसी स्थिति में "प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु" इस सूत्र से वृद्धि करके बहुवचन में "प्रौढाः" ऐसा रूप निष्पन्न होता है । अनतिप्रौढवंशप्रकाशैः—"पन्ना" नामक रत्नविशेष की कान्ति हरी होती है, उसकी हरियाली कच्चे बाँस के समान होती है, क्योंकि पके बाँस की हरियाली मलिन हो जाती है, अतः कवि ने "अनतिप्रौढ" ऐसा विशेषण लगाया वंश में । बद्धा—"बन्ध्" धातु से क्त प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में टाप् करके "बद्धा" ऐसा रूप निष्पन्न होता है । **वासः—**वसनं वासः = "वस्" धातु से भाव में कन् प्रत्यय करके वृद्धि करके "वास" ऐसा रूप निष्पन्न होता है । **शिञ्जा—**अव्यक्त अर्थ में विद्यमान "शिजि" धातु से इ की इत्संज्ञा होने के कारण "इदितो नुम्धातोः" इस सूत्र से नुम् करके परसवर्ण आदि करके "भिदिभदादिभ्योऽङ्" इस सूत्र से अङ् प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में "टाप्" करके शिञ्जा ऐसा रूप निष्पन्न होता है । कहीं-कहीं "शिञ्जद्वलयसुभगैः" ऐसा पाठान्तर मिलता है, परन्तु वह पाठ अशुद्ध है । क्योंकि "लटः शतृ-शानचावप्रथमाऽसमानाधिकरणे" इस सूत्र से जो शतृ और शानच् प्रत्यय होता है वह क्रम से परस्मैपदी धातु से शतृ और आत्मनेपदी से "शानच्" प्रत्यय